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स्वास्थ्य ढांचे का विकास और महामारी कानून, जानिए पूरा इतिहास

आपात स्थितियों से निपटने के लिये कानून और कानूनी ढांचे का सुदृढ़ होना बहुत ज़रूरी होता है। महामारी भी एक आपात स्थिति है जो जनता के स्वास्थ्य को न केवल खतरा पहुंचा सकती है, बल्कि अपने व्यापक कुप्रभाव से, समाज के कई समीकरण भी बदल देती है। आजकल हम नॉवेल कोरोना वायरस के संक्रामक प्रकोप जो दुनियाभर में फैला है, से पीड़ित हैं। यह संक्रामक वायरस, जिसके लक्षण एक सामान्य फ्लू से मिलते जुलते हैं अब इतना खतरनाक हो गया है कि दुनिया भर के देश इसकी दवा, इलाज और वैक्सीन खोज रहे हैं पर अब तक किसी को भी सफलता नहीं मिली है। लगभग हर देश में हेल्थ इमरजेंसी लागू है। सार्वजनिक जगहों पर पाबंदी है। सामाजिक मेल मिलाप बंद है और औद्योगिक गतिविधियां बंद हो गयी हैं। भय, और आशंका में जी रहा समाज एक मनोवैज्ञानिक संकट में भी है।

बात जब कानून की होगी तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि, महामारी, जिसे अंग्रेजी में एपिडेमिक या पैंडेमिक कहते हैं की परिभाषा क्या है। कानून में इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है पर समय, संक्रमण की गम्भीरता और उसके प्रभाव क्षेत्र के विस्तार के आधार पर सरकार किसी रोग के संक्रमण को महामारी या पैंडेमिक घोषित करती रहती है। यह भी देखा जाता है कि इस  महामारी का विस्तार कितना है या उसके संक्रमण का दायरा कितना फैल रहा है। जैसे कोविड 19 का संक्रमण देश के लगभग सभी राज्यों में फैल रहा है। देश मे पहला महामारी कानून 1897 में बना था। लेकिन उसके पहले, भारत में स्वास्थ्य ढांचे के इतिहास और क्रमिक  विकास पर विचार करना समीचीन होगा।

जन स्वास्थ्य या पब्लिक हेल्थकेयर के बारे में,  सुचारू रूप से, पहली बार ब्रिटिश राज में सोचा गया था। हालांकि आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति की जड़ें देश मे पहले से ही समृद्ध रही है। प्राचीन काल मे अस्पताल के स्वरूप का उल्लेख, आज की तरह व्यवस्थित रुप से नहीं मिलते हैं, लेकिन कुशल वैद्यों, आयुर्वेदाचार्य और बेहद कारगर आयुर्वेदिक औषधि की एक दीर्घ और समृद्ध परंपरा का उल्लेख ज़रूर मिलता है। शरीर माद्यं खलु धर्म साधनम, जैसे वाक्य स्वास्थ्य का महत्व बताते हैं। आयुर्वेद को पंचम वेद के रूप में भी कहा गया है। इसी प्रकार मध्ययुगीन भारत में, यूनानी चिकित्सा पद्धति, जो मूलतः यूनान से निकल कर, मिस्र होते हुए स्पेन पहुंची थी और वहां से फिर बगदाद  और फिर ईरान से होते हुए भारत आयी, का भी भारत के परंपरागत चिकित्सा व्यवस्था पर बहुत असर पड़ा है। जहाँ जहाँ यह पद्धति गयी वहां वहां से जो बेहतर मिलता गया लेते गयी। भारत में आयुर्वेदिक पद्धति के साथ इसका सम्मिलन हुआ। लेकिन वैद्य हों या हकीम, यह दोनों ही एकल चिकित्सक थे, आज की तरह के बड़े और बहुरोगी निदान के अस्पतालों का उल्लेख नहीं मिलता है। जन स्वास्थ्य या पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम की कोई अवधारणा नहीं थी।

अंग्रेजों ने भारत में कई ऐसी व्यवस्थाओं का सूत्रपात किया है, जिन पर हमारे कई महत्वपूर्ण संस्थाओं की नींव पड़ी है, पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम भी उनमें से एक है। यह सारी व्यवस्थाएं अंग्रेजों ने अपने हित में की थीं, लेकिन आज़ादी के बाद हमारे हेल्थकेयर ढांचे का आधार भी वही तंत्र बना है। ऐसी ही अनेक व्यवस्थाओं में से एक है, 1897 का महामारी रोकथाम कानून, जो आज इस आपदा में हमारे सारे आदेशों निर्देशों की एक वैधानिक पीठिका है। मात्र यही कानूनी तन्त्र ही नहीं, बल्कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के इस युग में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य का जो इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में आज है, उसकी शुरुआत भी, ब्रिटिश राज में ही हुई थी।

सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल की दीवानी ले कर, एक शासक के रूप में भारत की राज व्यवस्था में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। अंग्रेजी हुक़ूमत की शुरुआत, बंगाल से हुई थी, और बंगाल में, हैजा, मलेरिया, प्लेग एवं चेचक जैसे संक्रामक रोग उस समय बहुत होते थे। इन रोगों से लाखों लोगों की जानें जातीं थीं। इलाज के लिए लोग परम्परागत चिकित्सा विधियों पर निर्भर थे। लेकिन जब, ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में आयी थी तो वे अपने साथ, अंग्रेजी दवाएं और डॉक्टरों की टीम भी लाये थे। इसका एक कारण उन्हें प्राचीन भारत की परंपरागत चिकित्सा प्रणाली की जानकारी नहीं थी। वे भारत को यूरोपीय सभ्यता की तुलना में पिछड़ा हुआ समाज मानते थे, हालांकि उनका यह भ्रम जल्दी ही दूर भी हो गया।

प्लासी की विजय के बाद अपने कर्मचारियों और सैनिकों की चिकित्सा और स्वास्थ्य के लिए 1764 में, कम्पनी ने बंगाल में, मेडिकल विभाग खोला, जिसमें 4 प्रमुख सर्जन, 8 सहायक सर्जन तथा 28 सहयोगी सर्जन पहली बार तैनात किए गए, जो सभी अंग्रेज थे। एक हॉस्पिटल बोर्ड का गठन, सन् 1775 में राॅयल इंडियन आर्मी से सम्बद्ध सर्जन जनरल और फिजीशियन जर्नल की सदारत में किया गया, जिसका मुख्य काम यूरोपीय अस्पतालों का प्रशासन संभालना था।  बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसीडेंसियों में, सन 1785 में कम्पनी द्वारा, एक चिकित्सा विभाग का गठन किया गया, जिसमें 234 सर्जन थे। यह विभाग, सिविल और मिलिट्री दोनों ही सेवाओं के लिये संयुक्त रूप से बना था। सन् 1796 में इस हॉस्पिटल बोर्ड का नाम बदल कर मेडिकल बोर्ड कर दिया गया, और इसको म्युनिसिपल सेवाओं की जिम्मेदारी भी दे दी गई।

सन् 1857 के विप्लव के बाद 1858 में भारत का प्रशासन ब्रिटिश क्राउन के हाथ में सीधे आ गया और कंपनी बहादुर का राज इतिहास बन गया। कम्पनी राज में ब्रिटिश अपना ही हित देखते थे। लेकिन 1858 के बाद ब्रिटिश राज का भारत सीधा उपनिवेश बन गया। इस राज परिवर्तन के बाद, देश में, सिविल सर्विसेज के लिए, 1868 में, बंगाल में, एक अलग चिकित्सा विभाग खोला गया। इससे पहले 1864 में मिलिट्री मेडिकल आफिसर के अधीन सैनिट्री पुलिस फोर्स का भी गठन किया गया था, जिसे स्थानीय लोग बम पुलिस कहते थे। सन् 1870 से लेकर 1879 तक प्रत्येक प्रेसिडेंसी में सैनिट्री विभाग, और सभी प्रान्तों में, ब्रिटिश राज द्वारा, सैनिट्री बोर्ड भी गठित कर दिये गये थे ।

सन 1880 में तत्कालीन गवर्नर जनरल/ वाइसरॉय के निर्देश पर, सभी प्रान्तों में सैनिट्री इंजीनियरों की नियुक्ति एक कानून बना कर की गई। इससे पहले सन् 1802 में चेचक के टीके की खोज होने के बाद वैक्सीनेशन के लिए सुप्रीटेंडेंट जनरल ऑफ वैक्सीनेशन की नियुक्ति की गई थी। चेचक एक महामारी थी, जो उस समय बंगाल और उत्तर भारत में बहुत ही तेजी से फैलती थी। इसके टीकाकरण के लिये, सन 1827 में भारत में भारतीय सहायक वैक्सीनेटरों के साथ 4 यूरोपीय वैक्सीनेशन सुप्रींटेंडेंट नियुक्त किए  गए । सन 1870 में टीकाकरण का कार्य सैनिट्री कमिश्नर की देखरेख में सौंपा गया। यह पब्लिक हेल्थकेयर का पहला बड़ा प्रोजेक्ट था, जिसे सरकार ने शुरू किया था। इसके पहले टीकाकरण और निरोधात्मक चिकित्सा की कोई सुव्यवस्थित अवधारणा नहीं थी।

सन् 1869 में, प्रेसिडेंसी की प्रशासनिक व्यवस्था समाप्त कर दी गयी और  तीनों प्रेसिडेंसियों, कलकत्ता, बम्बई और मद्रास के चिकित्सा विभागों का विलय कर इंडियन मेडिकल सर्विस (आईएमएस) का गठन किया गया। यह सेवा सिविल क्षेत्र के लिये थी, और  सेना के लिए अलग से, राॅयल आर्मी मेडिकल कोर (आरएएमसी) का गठन किया गया जो कि 1919 तक भारत सरकार के अधीन रही। 1919 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद देश में,  मोन्टगोमरी-चेम्सफोर्ड संवैधानिक सुधारों के अंतर्गत, सार्वजनिक स्वास्थ्य स्वच्छता और सांख्यकी से जुड़े समस्त विषय प्रान्तीय सरकारों को हस्तांतरित कर दिए गए । यह एक प्रकार से विकेंद्रीकरण का प्रारंभ और संघीय ढांचे का सशक्तिकरण था। सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाते हुए 1920-21 में म्युनिस्पैलिटी एवं लोकल बोर्ड एक्ट पास होने के साथ ही इन स्थानीय निकायों को लोक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। मेयर नगर का प्रशासनिक प्रमुख होता था। नेताजी सुभाष चंद बोस अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती काल मे कलकत्ता के मेयर थे और नगर के रखरखाव में अपनी प्रशासनिक क्षमता का उन्होंने परिचय भी दिया था।

भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रान्तीय सरकारों को अधिक स्वायत्तता दिए जाने के कारण, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को, संघीय, प्रान्तीय तथा म्युनिसिपल इन तीन श्रेणियों में बांट दिया गया। सन 1939 में पब्लिक हेल्थ एक्ट पास हुआ जो कि भारत में अपने तरह का पहला एक्ट था। यह एक्ट एक प्रकार से लोक कल्याणकारी राज्य के सुदृढ़ीकरण में एक महत्वपूर्ण कदम है। सन् 1946 में भारत सरकार द्वारा देश में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं की स्थिति का सर्वे एवं सुधार हेतु सुझाव देने के लिए हेल्थ सर्वे एवं डेवलपमेंट कमेटी (भोरे कमेटी) का गठन किया गया। कमेटी के सुझाव पर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा, मेडिकल रिलीफ, मेडिकल शिक्षा, मेडिकल रिसर्च और अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर काम शुरू हुआ। आजादी के बाद सर्जन जनरल का पद खत्म कर के, उसके स्थान पर डाइरेक्टर जनरल ऑफ इंडियन मेडिकल सर्विसेज का पद बना दिया गया।

अब संयुक्त अस्पतालों के विकास के बारे में भी एक नज़र डालते हैं। मद्रास जनरल हॉस्पटिल भारत का पहला अस्पताल था जिसकी स्थापना 1679 में की गई । उसके बाद 1796 में कलकत्ता में द प्रेसिडेंसी जनरल हॉस्पिटल नाम से दूसरा अस्पताल खुला। डॉक्टरों की कमी पूरी करने के लिए सन् 1835 में कलकत्ता में मेडिकल कालेज की स्थापना की गई, जो कि एशिया का पाश्चात्य दवाओं पर आधारित पहला कॉलेज था। उसके बाद 1860 में लाहौर में मेडिकल स्कूल खुला। सन् 1854 में भारत सरकार छोटे अस्पतालों तक दवाएं एवं मेडिकल उपकरणों की सप्लाई के लिए सहमत हुई और इसके लिए कलकत्ता, मद्रास, बम्बई, मियां मीर और रंगून में सरकारी डिपो और स्टोर खोले गए। सन् 1918 में दिल्ली में लेडी रीडिंग हेल्थ स्कूल की स्थापना हुई । कलकत्ता में सन 1930 में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एण्ड पब्लिक हेल्थ की स्थापना हुई उसके बाद 1939 में कलकत्ता के पास सिंगूर में रूरल हेल्थ ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना हुई।

सन् 1880 तक ब्रिटिश शासनाधीन भारत में लगभग 1200 छोटे बड़े अस्पताल थे जो कि 1902 तक बढ़ कर 2500 तक पहुंच गए । सन् 1902 तक भारत में प्रत्येक 330 वर्गमील पर एक अस्पताल बन गया था। सन् 1880 में अस्पतालों में मरीजों की संख्या 74 लाख थी जो कि 1902 तक 2.2 करोड़ तक पहुंच गई थी। सन् 1896 में बम्बई में प्लेग का प्रकोप हुआ और पूना, कलकत्ता एवं कराची के बाद, 1897 में यह महामारी पूरे भारत मे संक्रमित हो गई। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इस रोग से, 20 लाख तक लोग मारे गए। इस महामारी पर नियंत्रण हेतु, 1896 में प्लेग आयोग का गठन किया गया। इस प्रकार देश को 1897 का महामारी कानून अस्तित्व में आया।

यह कानून, द एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 कहलाता है जो आज कोविड 19 की महामारी नियंत्रण में हमारा मुख्य कानूनी आधार है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य, खतरनाक और जानलेवा महामारी के संक्रमण को विधिनुकूल रूप से रोकना है। केवल चार धाराओं का यह एक छोटा अधिनियम है । धारा 1, इसके नाम और उद्देश्य, धारा 2, राज्य और केंद्र सरकारों को महामारी को नियंत्रित करने के लिये कुछ शक्तियां देती है, धारा 3, इन शक्तियों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के उल्लंघन पर कुछ दंडों का उल्लेख करती है, जो आईपीसी 1860 की धारा 188 के अंतर्गत दंडनीय है और धारा 4, इन कानूनों को लागू करने वाले अधिकारियों को कुछ संरक्षण प्रदान करती है।

यह एक्ट मानवाधिकार के नैतिक मूल्यों पर मौन है और तब मानवाधिकार की कोई स्पष्ट अवधारणा विकसित भी नहीं थी। यह कानून मुख्यतः बम्बई में ब्युबोनिक प्लेग की महामारी फैलने पर तत्कालीन वायसराय द्वारा बनाया गया था, जिसका मुख्य उद्देश्य था, तब के स्थानीय अफसरों को इस महामारी के नियंत्रण हेतु, कुछ अतिरिक्त अधिकार दिए जा सकें जिससे इसके बढ़ते और अनियंत्रित होते हुए संक्रमण को रोका जा सके। आज भी, कोविड 19 के संक्रमण को देखते हुए, कुछ राज्य सरकारों ने इसी एपिडेमिक एक्ट 1897 से प्रेरित होकर अपने अपने राज्यों में, कानून बनाये हैं। जैसे कर्नाटक एपिडेमिक डिजीज, कोविड 19 रेगुलेशंस, 2020, और हरियाणा एपिडेमिक डिजीज कोविड 19 रेगुलेशंस 2020, जो 12 मार्च 2020 को नोटिफाई किया गया और, महाराष्ट्र कोविड 19 रेगुलेशंस 2020, जो 14 मार्च 2020 को नोटिफाई किया गया।

इंपीरियल गजट ऑफ इंडिया के अनुसार वर्ष 1881-90 के बीच भारत की जनसंख्या 20,37,78,338 थी जबकि इस अवधि में हैजा, चेचक, ज्वर, अतिसार एवं अन्य बीमारियों से देश के विभिन्न हिस्सों में 49,86,950 लोग मरे जिनमें हैजा से मरने वालों की संख्या 3,06,518 एवं चेचक से मरने वालों की संख्या 1,22,772 थी। उस दौरान सबसे ज्यादा 33,59,927 लोग अकेले ज्वर से मरे थे। इसी प्रकार 1891-1900 के बीच 65,71,397 लोग विभिन्न व्याधियों से मरे जबकि उस दौरान देश की जनसंख्या 21,77,00,151 ही थी। उस दौरान हैजा से 4,50,502, चेचक से 82,588 ज्वर से 43,63,055 अतिसार या दस्त से 2,78,298 एवं अन्य रोगों से 13,96,936 लोग मरे।

कोविड-19 की तरह जब 1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी फैली थी तो, उस समय भी, पैंडेमिक एक्ट, 1897 का ही उपयोग किया गया था । 1898 के असम में कालाजार एवं बेरीबेरी जैसी बीमारियां फैलीं तो यही ब्रिटिश कालीन कानून लागू हुआ। स्वतंत्र भारत में भी वर्ष 2018 में गुजरात में हैजा रोकने, 2015 में डेंगू के नियंत्रण के लिए चण्डीगढ़ में, 2009 में स्वाइन फ्लू रोकने के लिए पुणे में, और आज देश भर में कोरोना वायरस की महामारी रोकने के लिए एकमात्र विकल्प के तौर पर इस कानून का प्रयोग किया जा रहा है। 2005 में एक आपदा प्रबंधन अधिनियम, संसद द्वारा पारित किया गया, लेकिन इसमें पैंडेमिक या महामारी आपदा ही नहीं, सभी प्रकार की आपदाएं, चाहे वह प्रकृति जन्य हों, मनुष्य जन्य, दोनों ही इसमें आती हैं।

2005 के इस एक्ट की धारा 2 (डी) में “आपदा” की परिभाषा दी गयी है, जिसके अनुसार, आपदा का अर्थ है,

” किसी भी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानवकृत कारणों से या उपेक्षा से उद्भूत कोई महाविपत्ति।”

भारत सरकार ने कोविड – 19 प्रकोप को “गंभीर चिकित्सा स्थिति या महामारी की स्थिति” के रूप में, इस अधिनियम के अंतर्गत “अधिसूचित आपदा” के रूप में शामिल किया है।

इस अधिनियम, की धाराएँ 51 से 60 तक महत्वपूर्ण हैं।

● धारा – 51, यदि कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी को उनके कर्तव्यों को पूरा करने से रोकता या बाधा डालता है, या केंद्र/राज्य सरकारों या एनडीएमए द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पालन करने से इनकार करता है तो वह व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दण्डित किया जा सकता है।

इस धारा के अंतर्गत, 1 साल तक की कैद एवं जुर्माना। हालाँकि, यदि उस व्यक्ति के कार्यों से जानमाल का नुकसान होता है, तो 2 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

● धारा 52 – इस धारा के अंतर्गत, वह मामले आयेंगे जहाँ यह आरोप लगाया जाए कि अभियुक्त ने कुछ ऐसा लाभ (राहत, सहायता, मरम्मत, निर्माण या अन्य फायदे) का दावा किया जो कि मिथ्या था, जैसे कि एक मामले में बाढ़ पीड़ितों हेतु वितरण के लिए लाये गए बिस्कुट को प्राप्त करने वाले व्यक्तियों (जो कि अभियोजन के मुताबिक बाढ़ पीड़ित नहीं थे) पर इस धारा को लगाया गया था।

इस धारा के अंतर्गत, दोष सिद्धि पर, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी, दंडनीय होगा।

● धारा 53 – यदि कोई व्यक्ति राहत कार्यों/प्रयासों के लिए किसी भी पैसे या सामग्री का दुरुपयोग, अपने स्वयं के उपयोग के लिए करता है, या उन्हें ब्लैक में बेचता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है।

इस धारा के अंतर्गत 2 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

● धारा 54 – यदि कोई व्यक्ति एक झूठा अलार्म या आपदा के बारे में चेतावनी देता है, या इसकी गंभीरता के बारे में चेतावनी देता है, जिससे घबराहट फैलती है जो कि वह जानता है कि झूठी है, तो उसका यह कृत्य इस धारा के अंतर्गत दंडनीय होगा।

इस धारा के अंतर्गत, एक वर्ष तक का कारावास या जुर्माना हो सकता है।

● धारा 55 – सरकार के विभागों द्वारा अपराध से सम्बंधित है।

● धारा 56 – यदि एक सरकारी अधिकारी, जिसे लॉकडाउन से संबंधित कुछ कर्तव्यों को करने का निर्देश दिया गया है, और वह उन्हें करने से मना कर देता है, या बिना अनुमति के अपने कर्तव्यों को पूरा करने से पीछे हट जाता है तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है।

इस धारा के अन्तर्गत, 1 साल तक की कैद या जुर्माना हो सकता है।

● धारा 56 – इस धारा के अंतर्गत, राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति, राज्य कार्यकारिणी समिति, या जिला कार्यकारिणी समिति को यह शक्ति दी गयी है कि वह किसी भी संसाधन, वाहन या भवनों की आवश्यकता पड़ने पर, जो उसे आपदा के जवाब में अपना काम करने के लिए चाहिए या आवश्यकता है, तो वह ऐसे संसाधन, वाहन या भवनों के सम्बन्ध में उनके रिक्विजीशन का आदेश जारी किया जा सकता है।

● धारा 57 – यदि कोई व्यक्ति इस तरह के अपेक्षित आदेश का पालन करने में विफल रहता है, तो वह इस धारा के अंतर्गत दोषी ठहराया जा सकता है।

इस धारा के अंतर्गत, 1 साल तक की कैद एवं जुर्माना हो सकता है।

● धारा 58 – कंपनियों द्वारा अपराध से सम्बंधित है।

● धारा 59 – अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी (धारा 55 और धारा 56 के मामलों में) से सम्बंधित है, वहीं धारा 60 न्यायालयों द्वारा अपराधों के संज्ञान से सम्बंधित है।

आपदा एक अवसर भी होती है। पर वह अवसर पूंजीपतियों के साम्राज्य विस्तार के बजाय, देश के स्वास्थ्य ढांचे के सुदृढ़ीकरण के रूप में होनी चाहिए। आज जब कोविड संक्रमण में हम दुनिया मे पांचवें नम्बर पर आ गए हैं तो हमें अपने स्वास्थ्य ढांचे की असलियत का पता चल रहा है। आज की स्थिति यह है कि, शोध पत्रिका,’लैंसेट’ के ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ नामक अध्ययन के अनुसार, भारत को स्वास्थ्य  मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर है। हम स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करते हैं, जबकि ब्राजील 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका 8.8 प्रतिशत खर्च करता है।  स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है।

देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति 1,000 आबादी पर 1 डॉक्टर होना चाहिए, वहां भारत में 7,000 की आबादी पर मात्र 1 डॉक्टर है। 1947 में, देश में निजी अस्पतालों की संख्या 8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 93 प्रतिशत हो गई है, वहीं स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश 75 प्रतिशत तक बढ़ गया है। आज इस महामारी में, निजी अस्पतालों की क्या स्थिति है, किसी से छुपा नहीं है। एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। रिसर्च एजेंसी ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 फीसदी शहरी और करीब 90 फीसदी ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं।

हमने स्वास्थ्य ढांचे के बजाय हेल्थकेयर के निजीकरण को अधिक प्राथमिकता दी इसका परिणाम यह हुआ कि आज जब आपदा ने घर घर दस्तक देना शुरू कर दिया तो, हमारे काम सरकारी अस्पताल ही आये, कोई निजी अस्पताल नहीं। सरकार को अपनी स्वास्थ्य नीति पर विचार करना होगा और बजाय निजी अस्पतालों के सरकारी हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देना चाहिए। अभी कोविड 19 के शिखर पर हम नहीं पहुंचे हैं लेकिन जिस तरह से अनलॉक हुआ है उससे लगता है कि हम बेहद कठिन समय में हैं। हर मुसीबत हमें कुछ न कुछ सिखाती है। इस महामारी ने यह बता दिया कि एक लोक कल्याणकारी राज्य में पब्लिक हेल्थकेयर का कोई विकल्प नहीं है। बीमा आदि की योजनाएं, अस्पतालों में इलाज के खर्च तो वहन कर सकती हैं पर वे अस्पताल और मेडिकल स्टाफ का  विकल्प नहीं बन सकती हैं।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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This post was last modified on June 9, 2020 8:17 am

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