Friday, January 21, 2022

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भारत के किसानों ने दिखायी दुनिया को कारपोरेट के खिलाफ लड़ाई की राह

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19 नवंबर, 2021 इक्कीसवीं सदी के इतिहास में जनता के संघर्षों की विजय का महापर्व बन गया है। भारत के किसानों और भारत के लोकतंत्रिक जन-गण ने विश्व के मेहनतकश  जनगण के सहयोग से विश्व विजयी कार्पोरेट पूंजी के खिलाफ पहली विजय हासिल की है। 1990-91 के तूफानी काल में विश्व विजय का झंडा फहराने वाला कारपोरेट पूंजी का साम्राज्य भारत में किसानों के अपराजेय जिजीविषा के समक्ष पहली पराजय स्वीकार करने के लिए मजबूर हुआ है। 1940 के दशक में चीन के किसानों के लांग मार्च के और विजयी चीनी जनवादी क्रांति के बाद भारत के किसानों का लगभग एक वर्ष से ज्यादा समय से चल रहा पूर्णतया अनुशासित और शान्ति पूर्ण आन्दोलन ने पहले चरण की जीत हासिल कर ली है। 

यह उपलब्धि उस दौर में हासिल हुई है जब आजाद भारत में सबसे निरंकुश विघटन कारी और वैचारिक तौर पर आपराधिक कार्यशैली मे दक्ष एक संगठित राजनीतिक समूह राज्यसत्ता पर काबिज है। जिसे दानवी कारपोरेट पूंजी का खुला समर्थन प्राप्त है। जो कारपोरेट मित्रों  को लाभ पहुंचाने और संबंधों को खुले रूप से प्रदर्शित करने में किसी भी तरह की लोकतांत्रिक नैतिकता की जरा सी भी परवाह और सम्मान नहीं करता। इसके उल्ट वह ढिठाई के साथ अपने लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्तियों को  योग्यता और राष्ट्र सेवा के तौर पर दृढ़ता से राष्ट्र के समक्ष पेश करता है। जिसको कारपोरेट मीडिया का खुला और बेशर्म समर्थन प्राप्त है। इस सरकार ने सभी तरह की 

राजनीतिक लोकतांत्रिक तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपने लौह शिकंजे में कस लिया है। राज्य मशीनरी को गैर लोकतांत्रिक कार्य में फंसा कर कानून के शासन का विनाश करते हुए अपने  फासिस्ट एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने के लिए उद्धत‌ है। इसलिए भारत के किसानों के संघर्ष की विजय वैश्विक महत्व प्राप्त कर लेती है। इस जीत के बाद भारत के अन्य उत्पीड़ित जन गण किसान मजदूर छात्र नौजवान तथा वैश्विक पूंजी के शोषण के खिलाफ लड़ने वाली ताकतें एक नए उत्साह और साहस के साथ संघर्षों को आगे बढ़ाने की तरफ बढ़ सकती हैं।

संघर्ष की मौलिक करो कल्पना

किसान आंदोलन में संघर्ष की नई विधा का विकास किया है। जो अभी तक विश्व के आंदोलनों के इतिहास में सर्वथा मौलिक दिशा है। हम देख रहे हैं कि पिछले 1 वर्ष से अधिक समय से लाखों किसान दिल्ली के सीमा के चारों तरफ बैठे हैं। अगर आप किसानों के मोर्चे पर जाएं तो देखेंगे की लाखों किसान अपने ट्रैक्टरों को प्लास्टिक के टुकड़ों से ढक कर और बांस टिन, प्लास्टिक तथा लोहे के बड़ी-बड़ी पाइप के खंभे खड़ाकर लंबे-लंबे आवासीय घर बना लिए हैं। जहां जाकर आपको लगेगा कि यह किसी सैन्य बल की छावनी है जहां लड़ाकू सैन टुकड़ियों के रहने का स्थान है। आंदोलन स्थल ने नये तरह के शब्द और भाषा की रचना की है। जैसे मोर्चा। अभी तक दुनिया में युद्धों के दौरान दो प्रतिद्वंदी सैन्य बलों की टुकड़ियों के रहने और लड़ने की जगह को मोर्चा कहा जाता रहा है। लेकिन किसानों के आंदोलन की जगह को हम भारतीय और विश्व के लोगों के मनो मस्तिष्क में मोर्चा के रूप में समझने देखने का एक नया नजरिया बना है। 

बोलचाल में लोग आमतौर पर मोर्चा या बॉर्डर पर किसानों का मोर्चा कहते रहे हैं। क्या विसंगति है। एक लोकतांत्रिक देश की राजधानी के इर्द-गिर्द उसके सबसे बड़े उत्पादक समूह किसान का अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से बैठना मोर्चे के अर्थ में तब्दील हो गया। बात साफ है कि इस लड़ाई को लोगों ने जनता और एक निरंकुश सरकार के खिलाफ चल रहे अघोषित युद्ध के अर्थों में ही लिया है। यह अकारण नहीं है। जब किसान दिल्ली के लिए चले तो दिल्ली की सीमाओं पर भारत की लोकतांत्रिक सरकारों ने जिस तरह का व्यवहार किसानों के साथ किया और जिस तरह की घेराबंदी और मोर्चाबंदी की उसी से आम भारतीय नागरिक के दिमाग में सरकार और किसानों के बीच में मोर्चाबंदी जैसा संदेश चला गया। दिल्ली की तरफ बढ़ रहे किसानों के जत्थे को जब सरकार और उसके प्रशासनिक तंत्र ने निर्ममता पूर्वक रोक दिया तो प्रतिवाद में किसान उसी जगह बैठ गये। जहां किसान बलपूर्वक रोक दिए गए थे। वही जगह आंदोलन स्थल में तब्दील हो गई। यहीं से बॉर्डर पर लगे मोर्चे का एक नया विचार और संदेश भारतीय नागरिक के दिमाग में पहुंचा। इतिहास में इसे भी मोदी सरकार की उपलब्धि माना जाएगा। इस घटना से मोदी सरकार के बारे में भारत सहित दुनिया के देशों में एक संदेश गया कि वह लोकतंत्र और अपने नागरिकों से  युद्ध लड़ रही है।

बार्डर का मोर्चा स्थल और उसकी विशिष्टता 

मैं अपने मित्रों से बार-बार यह गुजारिश करता रहा हूं कि इस दौर में किसी तीर्थ स्थल या ऐतिहासिक जगह देखने की जगह वे कम से कम दो-तीन दिन के लिए दिल्ली के निकट किसानों के मोर्चे पर जरूर जाएं। वहां जा कर देखें कि कौन से लोग हैं। क्या ये उसी भारत के नागरिक हैं जहां जहर खुरान संस्कृति ने जन्म ले रखा है। क्या यह उसी भारत की भूमि है जहां साइबर क्राइम धोखाधड़ी हत्या और बलात्कार की घटनाएं दैनंदिन जीवन की अंग बन गई हैं। जहां खुदगर्जी स्वार्थ जीवन का मूल मंत्र है। जहां सफल होने के लिए किसी भी हद तक गुजर जाने के लिए लोग मजबूर हों। आपको वहां जाना चाहिए । 

क्योंकि हम जिस दुनिया में रह रहे हैं वहां रंग रूप उपासना धर्म वस्त्र देखकर मनुष्य के प्रति हिंसा और घृणा का अभियान सर्वोच्च सत्ता पर बैठे हुए लोग चलाते हैं। जहां विरोधी विचारों के प्रति कोई सम्मान नहीं है। बल्कि उससे  समाज राष्ट्र के लिए खतरा बताने का दैनंदिनी अभियान चलाया जा रहा है। आप मोर्चा स्थल पर जाकर समझेंगे कि भारत के मीडिया संस्थानों में बैठे हुए लोग क्या उसी देश के प्रतिनिधि हैं जिस देश के लाखों लोग कठिन अमानवीय स्थितियों में दिल्ली के बॉर्डर पर अगल-बगल बैठे हैं। एक दूसरे को बिना जाने पहचाने ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे उनका  प्रियजन हो। जहां भूख और अभाव के लिए कोई जगह ना हो। जहां  हजारों लोगों को मुफ्त जरूरत के सामान मुहैया हो रही हैं। जहां आपके पहुंचने पर आपका स्वागत किसी प्रिय जन की तरह से हो। जो हमारे अतीत में था। क्या है राज इस दुनिया का। मैंने तीनों मोर्चे पर थोड़ा समय बताए। उसने कुछ ऐसी आत्मशक्ति दी आत्म चेतना दी आत्म संघर्ष के लिए एक ऐसा वातावरण निर्मित किया जिसके बिना इस सिस्टम से टकराने की तो बात छोड़िए आंख मिलाकर बात करने की हिम्मत भी ना आ पाती। न जाने कहां से ये मनुष्य आ गए हैं। 

हम जिस वातावरण में रह रहे हैं वहां तो ऐसी आत्मीयता नहीं है। वहां तो ऐसा सहयोग समन्वय सद्भाव नहीं है। यहां नये मनुष्यता का उत्सव चल रहा है। ऐसा उत्सव किसी समाज और राष्ट्र में कभी कभार ही इतिहास के पन्नों में ढूंढने पर मिलेगा। हजारों झोपड़ियों में बैठे हुए किसान आपको देखते ही स्वागत करते हुए उठ खड़े होंगे। जैसे लगता है कि वे आपको बरसों से जानते हों। आपके ठहरने की जगह खोजने की जरूरत नहीं है। आपको खाने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है। वस्त्र और दवा जैसी बुनियादी चीजें वहां दी जा रही हैं। जैसे लगता हो कि तीर्थ स्थल पर दान करके पुण्य लाभ मिल रहा हो। यहां धरती पर कोई देव लोक आ गया है। विरले ही कोई ऐसी घटनाएं हुई होंगी जहां हमने पूंजीवादी सभ्यता के इस सबसे  बर्बर दौर की झलक देखी हो। 

जहां खुदगर्जी के लिए को कोई जगह नहीं। बुरे वक्त से गुजरते हुए षड्यंत्रकारी सत्ता के सारे मंसूबों को उसी तरह से निष्प्रभावी कर दिया जाता है जैसे जलते हुए पिंड पर पानी की बौछारें अपना प्रभाव दिखाती हों। वहां आपको पंजाब और हरियाणा के अलमस्त और जिंदादिल खुले दिलवाले उर्जा और मोहब्बत से लवरेज किसान मिलेंगे। जैसे भारत के क्रांतिकारियों की आत्मा इस निर्मम दौर में भी जिंदगी का उत्सव मना रही हो। गाते नाचते हंसते खेलते कूदते जिंदगी के सारे उत्सव मनाते हुए लोग आंदोलन कर रहे हैं। जब प्रेम सहयोग और समन्वय आपसी भाईचारा भी आंदोलन की शक्ति और हथियार बन जाए। जब नफरत का वायरस भारत भूमि में संघनीति सरकार फैला रही हो तो वहां प्रेम करना भी आन्दोलन है। वहां गीत और संगीत की रचना और उसे खुले दिल से प्रस्तुत करना भी सत्ता के लिए डरावना बन जाता है। मैंने देखा किस तरह से छोटे-छोटे नौजवानों से लेकर  85 साल के बुजुर्ग पंजाबी किसान नृत्य संगीत का शमा बांधते हैं। इससे सत्ता की बंदूकें और बारूदी ताकतें कितना भयभीत हो जा सकती हैं। 

यहां मैंने पहली बार लंगर और भंडारों में सेवा कर रहे सेवादारों को देखा। महिलाओं को मनोयोग से काम करते देखा। सामूहिक नृत्य गीत-संगीत और नारे सबसे क्रूर सत्ता के लिए दुख स्वप्न बन जाते हैं। मैं सोचता था कि अजेय कही जाने वाली संघी राजनीति की अमानवीयता क्या किसान मोर्चे‌ के सत्य अहिंसा के हथियारों से पराजित हो सकती है। यहां आकर संशय समाप्त हो गया। 

किसान आन्दोलन ने  शब्दों के अर्थ बदल दिए। सीमा पर लगे मोर्चा से बारूद नहीं प्रेम निकलता है। वहां हिंसा का तांडव नृत्य नहीं होता। वहां प्रेम सहयोग के संगीत और मनुष्य की सर्वोच्च आत्मा का सृजन और दिग्दर्शन होता है ।इसलिए क्रूर से क्रूर पूंजी की सत्ता भी मनुष्यता से डरती है। उसके भाईचारा से डरती है। उसकी एकता से डरती है। उसके प्रेम मोहब्बत से डरती है। मनुष्य के एक दूसरे के सुख-दुख में साथ देने से डरती है। सीमा पर वह कौन सा आदर्श है वह कौन सी चेतना है जिसने इतने बड़े मंजर को जन्म दिया। मनुष्यता के कुंभ का सृजन किया है।

अमानवीय पूंजी चाहती है कि हम अपनी अस्मिता को समर्पित कर दें। उनके चरणों में बैठ जाएं। उसकी दासता स्वीकार कर लें। लेकिन यहां तो ठीक उलट था। इस महाकुंभ के जो टेंट हैं वास स्थल हैं वहां दान पेटियां नहीं हैं। चढ़ावा के लिए अपील नहीं है। वहां आप को खिलाया जा रहा है। सुलाया जा रहा है। मोहब्बत से बातें हो रही हैं। आपको विश्वास दिलाया जा रहा है कि हम जीतेंगे। हम हार नहीं सकते। हम हार मानने वाले लोग नहीं हैं। हम मौत से नहीं डरते। हम जीत और मृत्यु दोनों में एक ही फूलों का हार इस्तेमाल करेंगे। एक ही फूल की माला हमारी दोनों स्थितियों के लिए तैयार रखा है ।आप सोचते होंगे हिटलर मुसोलिनी के वारिस गुजरात दिल्ली के जनसंहार के रचनाकार लखीमपुर में किसानों को गाड़ियों से रौंद कर मार देने वाले लोग इससे क्या डरेंगे। भला किसान इनसे जीत सकते हैं। कहां उनके पास शक्ति है। कहां उनके पास साहस बचा है। वे कोई हथियार प्रयोग करके इस एकता को तोड़ दे सकते हैं।

लेकिन सरकार ने सब कुछ कर के देख लिया। षड्यंत्र रचे गए। किसानों को खालिस्तानी पाकिस्तानी माओवादी नक्सली कहा गया। सभी हथियार चलाए गए। सत्ता तंत्र ने एक स्वर में कहा कि यहां से किसानों को हटाओ । इनसे हमारी सभ्यता को खतरा है। लोकतंत्र को खतरा है। हमारी राजधानी को खतरा है। यह उसे गंदा करने आए हैं यह लुटेरे गिरोह हैं। लेकिन आने वाले लोग बेपरवाह थे इन सब बातों से। इन हमलों से। वे रोज अपनों में से किसी को मरते हुए देख रहे थे। लाशों पर कफन चढ़ा रहे थे। फूल माला चढ़ा रहे थे कंधे दे रहे थे ।वे उन्हें उत्साह और उल्लास ,दर्द और पीड़ा के साथ गांव पहुंचा रहे थे। गांव के गांव शहीदों के पार्थिव शरीर के दर्शन के लिए पहुंच रहे थे। शहादतें नई शक्ति दे रही थीं ।हर एक मृत आत्मा एक नया संदेश का उद्घोष कर रही थी। हजारों लोगों को प्रेरित कर रही थी।

 नागरिक समाज में एक जिज्ञासा पैदा हुई कि देखें ये कौन से लोग हैं जो ट्रकों गाड़ियों में लद फद कर पत्थर दिल दिल्ली आ रहे हैं। राजधानी का नागरिक समाज चकित हो कड़ाके की ठंड को देखते हुए ऊनी वस्त्र खाने नहाने के सामान लेकर पहुंचने लगे। इस के बाद तो मोर्चा लग ही गया। मुझे कई लोगों ने बताया दर्जनों ऐसे परिवार थे जिनके यहां शादी हुई तो उन्होंने मोर्चे के लिए अतिरिक्त मिष्ठान तैयार किए और कई कई कुंतल मिठाइयां लाकर बांट गए । लेने वाले भी ऐसे लोग जो जरूरत से ज्यादा न लेकर दूसरों को बांट रहे थे। लखनऊ में एक मंत्री द्वारा गरीबों को अपने जन्मदिन पर साड़ी बांटी तो लेने की होड़ में कई लोग मर गए। यहां लोग एक दूसरे से पूछ रहे थे उनके पास है कि नहीं।  वह पूछ रहे थे किसको मिला किसको नहीं मिला। जिसको नहीं मिला उस तक पहुंचा रहे थे। लूट की होड़ नहीं थी। कोटे की दुकानों पर ललचाए हसरत भरी नजरों से बिना कार्ड के खड़े अनाज की लालच में लोगों की तरह ये लोग नहीं थे। वह तो यह देख रहे थे कोई छूट न जाए। मैं हलवा खाने के बाद चलने के लिए सामान उठाया कि एक बंदा दौड़ता हुआ आया और पूछा कि लग रहा है आप चाय पीना चाहते हैं। उसने हम लोगों के लिए चाय बनाई। 

हम चाय पी लिए तो हाथ जोड़कर उसने हम को विदा किया। यह कौन सी दुनिया के लोग हैं। इस रहस्य को समझना होगा। यही तो वह रहस्य है जिसने आज हमें जीत का स्वाद चखने का मौका दिया। पंजाब के किसानों ने पूंजी के लूट के दौर में मानवीय गरिमा को बचाए रखा है। सिख धर्म की लंगर सेवा भावना सहयोग समन्वय और मनुष्य को मनुष्य समझने उसे सम्मान देने की परंपरा ने इस आंदोलन को ऊंचाई पर पहुंचाया। जीतने की ताकत दी। हरियाणा की खाप पंचायतों में संगठित किसानों ने सत्ता की बंदूकों को मोड़ दिया। हरियाणा जैसे छोटे प्रदेश में 48000 मुकदमे किसानों पर लादे गए हैं। हरियाणा और पंजाब का कोई भी गांव या घर नहीं बचा है जो इस आंदोलन का दुर्ग ना बन गया हो। 

हरियाणा एक गांव से सभी औरतों ने फैसला लिया कि पुरुष घर पर रहेंगे। हर एक महिला बॉर्डर पर जाएगी और वहां  600 से ज्यादा महिलाएं आईं और 15 दिन तक टिकरी बॉर्डर पर डटी रहीं। हम जिन्हें सबसे ज्यादा कमजोर और उत्पीड़ित समझते हैं। वे औरतें आन्दोलन की रीढ़ हैं। जीत मिलने पर पहले उन्हें सम्मानित किया जाएगा। जीत का पहला माला इनके गले में पड़ेगा। लगता है आजादी के संघर्ष की वीरांगनाएं नए रूप में अवतरित हो गई हैं। किसान आंदोलन में औरतों की भूमिका बढ़ी और उनके बीच से कई नए नेतृत्वकारी महिलाएं निकल कर सामने आई हैं ।

सत्ता से संघर्ष    

हिंसक सत्ता तभी डरती है जब निहत्थे लोग उससे डरना बंद कर देते हैं। किसानों, मजदूरों तथा गरीब लोगों ने अब शासन सत्ता से डरना  बंद कर दिया है। लोगों ने भय को तिलांजलि दे दी है। विगत 7 वर्षों में इसी डर को अनेकानेक तरीके से नागरिकों के अंदर भरा गया था।

इस मोर्चे ने सभी तरह के विमर्श को बदल दिया है। यह भारत-पाक के बीच का बाघा बॉर्डर नहीं था। न राजस्थान जम्मू कश्मीर का कोई सीमावर्ती मोर्चा था और ना ही कच्छ का रण था। दिल्ली की सीमा के इर्द-गिर्द किसानों का पड़ाव था। जो हमारे लोकतंत्र के सर्वोच्च केंद्र राजधानी दिल्ली के चारों तरफ  बैठे भारत के लाखों किसानों का सत्ता के साथ संवाद था ।लेकिन सरकार संवाद भी करने के लिए तैयार नहीं है। वह किसानों के दर्द को समझने के लिए तैयार नहीं है ।वह इतनी पाखंडी और घमंडी है कि 700 से ज्यादा किसानों की मौत का दर्द भी सुनने के लिए तैयार नहीं है। अरबों रुपए अपने ऊपर खर्च करते हुए प्रधानमंत्री जी तपस्वी बनने का स्वांग रच रहे हैं।इनके हिंसक प्रवृत्ति को दुनिया ने देखा है । अब उनका झूठ और पाखंड देख रही है।

आंदोलन में शहीद हुए किसानों के लिए शहीद स्थल की मांग आज महत्वपूर्ण मार्ग बन चुकी है। यह आजादी और किसानों के मुक्ति का पवित्र पूजा स्थल होगा। इसी शहादत से तो हारना पड़ा और आने वाले समय में जब मनुष्यता के सर्वोच्च गीत लिखे जाएंगे जब मनुष्य की शक्ति का सर्वोच्च उत्सव होगा ।तब कोई कालिदास मीठे स्वर से गीत गुनगुनायेगा, कोई मुक्तिबोध सृजन का संदेश देगा, कोई राहुल सांकृत्यायन अनुसंधान करेगा ,वह जिस शब्द को निर्मित करेगा और जिस खोज को लेकर आएगा मनुष्यता के विराट ज्ञान भंडार में अमूल्य धरोहर होगी। वह धरोहर हमारे सभ्यता का तीर्थ स्थल होगा। जहां प्यार सहयोग समन्वय भाईचारा की शहनाई बजेगी।    मनुष्यता का सर्वोच्च दिग्दर्शन विश्व के जनगण करेंगे। 

जहां खून दरिया से गुजरते हुए किसी मंदिर मस्जिद का निर्माण नहीं होगा। हजारों लोगों को बेघर कर जला कर मार कर बनाया गया किसी अन्यायी सत्ता का मंदिर नहीं होगा। दरिद्रता के पर्वत शिखर पर बैठा तानाशाह ऐय्याशी का विस्टा नहीं बना सकेगा। प्यार का सहयोग का साहस का मानव की शक्ति का मानव के उत्कर्ष का  शहीद स्थल जरूर बनेगा।जो क्रूर शासकों को उनकी बर्बरता की याद दिलाता रहेगा। तुम मनुष्य को पराजित नहीं कर सकते। 

तुम मनुष्यता का नाश नहीं कर सकते। तुम किसी एक काल खंड में उसे धोखा नहीं दे सकते हो। तुम आधुनिक तकनीक और पूंजी की सत्ता की ताकत का प्रयोग कर कुछ समय के लिए उसे जरूर सम्मोहित कर सकते हो। लेकिन इसे स्थाई भाव में नहीं बदल सकते। राष्ट्र और समाज का स्थाई भाव सीमा पर किसान नागरिक समाज युवा छात्र कलाकार साहित्यकार समाजसेवियों और लंगर सेवादारों की सेवा ही होगी। इतिहास के पन्नों में सेवा और शहादत देने वालों का एक-एक नाम ढूंढा जाएगा। हो सकता है उन पर कोई रेखाचित्र न बनाए ।कोई गगनचुंबी विराट मूर्ति ना खड़ी करे ।लेकिन विराट मूर्तियां भी उसके समक्ष बौनी हो जाएंगी। भव्यता का पाखंडी प्रदर्शन मनुष्यता से ऊंचा नहीं हो सकता। किसी मंदिर के कंगूरे और मस्जिद की मीनारें नहीं हो सकतीं।भव्य अगर कुछ होगा को वह मनुष्य होगा ।

उसकी संवेदना करुणा दया मनुष्यता की प्रवृत्ति ही होगी ।जिसे सबसे ऊंचे स्थल पर प्रतिष्ठित किया जाएगा। निश्चय ही भारत के लोग अपने सर्वोच्च स्थल पर बैठेंगे। दलाल देशद्रोहियों की जमात के कीड़े मकोड़ों तुम हमारे आजादी के संघर्ष को जो चाहे कह लो। हमारे शहीदों की कुर्बानी को जितना चाहो प्रदूषित करने की कोशिश करो ।लेकिन तुम्हारे सामने ही उसकी सर्वोच्च गरिमा को उन्नत करने वाले लोग सीना तान के खड़े हैं ।तुमने उनको बहुत कुछ कहा ।तुमने अपने अंग्रेज मालिकों की तरह इन्हें आतंकवादी, विध्वंसक, राष्ट्र विरोधी,  षड्यंत्रकारी देश को तोड़ने वाला कहा। लेकिन देखो तुम्हें माफी मांगनी पड़ी। तुम्हें झुकना पड़ा। तुम्हें इनके सामने समर्पण करना पड़ा ।सबक लो ।अगर तुम किसी षड्यंत्र के तहत पीछे हटे हो, पुनः हमले के लिए मोहलत पाने के लिए किया है तो फिर ऐसी गुस्ताखी मत करना। ऐसे षड्यंत्र रचने से बाज आओ । इन को पहचानो। यही भारत के  लोग हैं। हमारा संविधान कहता है हम भारत के लोग हैं। इसलिए किसी षड्यंत्र की पुनर्रचना की तरफ मत जाना। अपने खरबपति कारपोरेट मित्रों को संपदा लुटाने के लिए फिर से कानून बनाने की तरफ मत जाना। हम जानते हैं कि तुम नहीं बदलोगे। इस आवाज को नहीं सुन सकते नहीं समझ सकते। 

करोड़ों खर्च करके महान होने का दिखावा और गढ़ी गई महानता की झूठी तस्वीर श्रम की भट्टी में तपे हुए किसान के सामने बौनी लगती है। 1 वर्ष के संघर्ष से  निकला हुआ नया मनुष्य है। इसने साधना की है ।कष्ट सहा है। बुद्ध की तरह से आत्म पीड़ित किया है। गांधी की तरफ से निश्चल भाव से इस ने डांडी मार्च किया है ।भगत सिंह की तरह से सत्ता के सामने सीना तान कर खड़ा हुआ है ।इसलिए सबक लो। इतिहास से सीखो। तुम इसे पराजित नहीं कर सकते। बेहतर है सीख लो। इससे नई दीक्षा लो। तुम बहुत दीक्षा लेने की बात करते हो। साधना करने की बात करते हो ।राष्ट्र सेवा करने का झूठा पाखंड रचना बंद करो। राष्ट्र सेवकों की जमात को पहचान करके नए सिरे से भारत के बारे में सोचो। 

आंतरिक आत्मा और पवित्र मन की बात करते हो। तपस्या की बात करते हो ।यह सच नहीं है । कलुषित आत्मा वाले हो तुम । तुम सहस्त्र वर्णीय इस भारत को नहीं जीत सकते। भारत बंद के बाद मैंने अपने छोटे से आलेख में लिखा था कि संघ नीति भारत से हार रही है ।भारत की विविधता के सामने उसे पराजित होना है। इसे पराजय मत समझो। मनुष्यता के वापसी का उत्सव मनाओ। हम जानते हैं तुम ऐसा नहीं कर सकते। तुम जिस पाठशाला से पढ़कर आए हो उसने तुम्हें अंदर से मनुष्य नहीं रहने दिया है। तुम्हारी मनुष्यता की संवेदना को मार दिया गया है। छियासी लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के होने की बात करते हो।कई लाख की सेना खड़ी कर देने की बात करते हो ।लेकिन यह सब मनुष्य के उत्साह बलिदान के सामने कहीं नहीं ठहरते। एक नारा था इस मोर्चे पर, कि हम नहीं हटेंगे। हम यहीं रहेंगे। हम जीत के जाएंगे। कानून वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं। यह दृढ़ संकल्प था। क्या कर रहे हो। तुम्हारे मित्र पूंजीपति भारत की गरीब जनता का खून चूस कर मोटे होते जा रहे हैं ।एशिया के सबसे मोटे लोगों में हो गए हैं। लेकिन याद रखो कि यह लूट नहीं चलेगी। भारत वह नहीं है जो 5 जून 2020 से पहले था।अब यह 26 नवंबर 2021 का भारत है। इस भारत को समझने की जरूरत है। 

उनको भी समझने की जरूरत है जो भारत को कैद करना चाहते हैं। भारत को बांट देना चाहते हैं। जो बर्बरता हिंसा और घृणा विस्तार चाहते हैं ।लेकिन उनसे ज्यादा उनको समझने की जरूरत है। जो भारत को खूबसूरत बनाना चाहते हैं। इस खूबसूरत गुलशन में एक और नया लोकतंत्र का फूल खिलाना चाहते हैं। बराबरी का फूल खिलाना चाहते हैं भाईचारा का फूल खिलाना चाहते हैं। आजादी का स्वतंत्र गान चाहते हैं। बंधुता भाईचारा का संगीत सुनना चाहते हैं। वह भी इस नई दुनिया को समझें। अभी भी कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अपने स्वप्नलोक में केंद्रित है। वे उच्च वर्गीय किसानों और वर्ण व्यवस्था के अपने गंदे चश्मे से इस आंदोलन को देखने की कोशिश कर रहे हैं। दूर से बैठकर इस पर टिप्पणी लिख रहे हैं। उन्हें भी समझना चाहिए। विपक्षी दलों को भी समझना चाहिए जो भारतीय फासीवाद से लड़ना चाहते हैं। जो आज के संघात्मक धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं। इस जीत के गर्भ में भविष्य के सुनहरे भारत का भविष्य पल रहा है। आइए इसकी साधना में लगे।

(जयप्रकाश नारायण सीपीआई एमएल की कोर कमेटी के सदस्य हैं।)

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