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इतिहास के खतरनाक मोड़ पर खड़ा हो गया है राजनीतिक लोकतंत्र

इस अर्थ में कि वहां उसके सभी स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा खंभा प्रेस भी उतना ही मुस्तैद है। पर पिछले चुनावों के दौरान वहां जो हुआ, वह एक अर्थ में पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सीमा का आईना कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कोई भी डेमागॉग (भाषणबाज), रंगभेदी, नस्लवादी, सांप्रदायिक और वर्णवादी दुनिया के किसी भी कोने में इस उदार व्यवस्था को सर के बल उल्टा खड़ा करने में देर नहीं लगाता है। इसके उदाहरण लातिन अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप और एशिया में लगभग हर कदम पर, एक नहीं अनेक मिल जाते हैं।

अफ्रीका और एशिया में जहां कहीं भी पिछली सदी के मध्य तक उपनिवेश थे आजादी के बाद उन सभी ने, अपने औपनिवेशिक आकाओं की देखरेख में, कमोबेश लोकतंत्र का रास्ता अपनाया पर तमाशा यह हुआ कि इनमें से अधिसंख्य को देखते ही देखते तानाशाही में बदलने में समय नहीं लगा। जोमो केन्याता जैसे नेता ने, जिन्होंने औपनिवेशिक विरोधी संघर्ष में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, अपनी आत्ममुग्धता और सत्ता लोलुपता से उस सब पर पानी फेर दिया। और उन्हें आततायी बनने में समय नहीं लगा।

यद्यपि सामाजिक और सांस्कृतिक स्थितियां भिन्न हो सकती हैं पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, जो कुल मिलाकर जनमत पर बनती है, न जाने कब तानाशाही को जन्म दे दे। क्या अनुमान लगाया जा सकता है  कि अगर संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को एक और जीत मिल जाती तो उसके बाद इस देश के ‘उदार’ लोकतंत्र का क्या होता और तब क्या इसे वापस पटरी पर आसानी से लाया जा सकता था?

अमेरिकी अनुभव से एक और बात भी स्पष्ट होती है कि लोकतंत्र और समानता के मूल्यों में कुल मिलाकर समर्थ और संपन्न वर्गों की निष्ठा तभी तक रहती है जब तक कि उनके विशेषाधिकार बने रहते हैं। उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर बहुत कम आंच आती है। जैसे ही यह होता है वैसे ही बहुसंख्यक और विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की उदारता की केंचुल उतर जाती है।

अमेरिका ही नहीं भारत की स्थिति को भी इसी पैमाने पर सही-सही समझा, परखा और उसका मूल्यांकन किया जा सकता है। यह मात्र इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि दोनों में लोकतांत्रिक व्यवस्था है बल्कि इसलिए भी किया जाना चाहिए कि दोनों में एक खास तरह की समानता है, जो इनके समाजों को दो हिस्सों में बांटती है। एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग है, तो दूसरा शोषित और हाशिये पर धकेला हुआ। सीधे कहें तो अमेरिका में अगर गुलाम बनाकर लाए गए अफ्रीकी मूल के काले लोग हैं, तो भारत में छोटी जातियां हैं जिनके साथ कुल मिलाकर कालों से ज्यादा नहीं तो कम से कम उनके बराबर का ही भेदभाव आज हजारों वर्ष बाद भी जारी है।

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के आने और भारत में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने में इस मामले में कुछ आधारभूत समानताएं हैं। अगर वहां ट्रंप के रूप में श्वेतों के हितों की वापसी हुई थी, तो भारत में उच्च जातियों की, जो आज भी जारी है। दोनों की विजयों के पीछे देश के प्रभावशाली वर्ग के साथ ही बड़ी पूंजी भी थी और दोनों ही सज्जनों ने पूरी निष्ठा के साथ इस पूंजी और उसके मालिक सत्ताधारी वर्ग के हितों का हर संभव प्रतिनिधित्व किया है। अमेरिका में वे श्वेत हैं तो भारत में उच्च जातियां हैं जो अल्पसंख्यक होने के बावजूद सत्ता पर सदियों से काबिज हैं। जो काम मोदी ने अपने सात साल के शासन में किया है वही काम ट्रंप ने अपने चार साल में किया। अमेरिकी जनतंत्र की यह बड़ी सफलता है कि उसने इस तरह के एकांगी शासन से जल्दी ही निजात पा ली है।

निश्चय ही इस परिवर्तन ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सफलता पाई पर जो कई बातें इस व्यवस्था की कमियों के रूप में सामने आ रही हैं उनमें सबसे ज्यादा गंभीर अगर कोई है तो वह पैसे का इस्तेमाल है। पैसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था को विकृत करने की जो ताकत है वह सारी दुनिया में देखी जा सकती है। पर दुर्भाग्य से इन दोनों ही देशों के चुनावों में विगत दो वर्षों के दौरान पैसे ने जो भूमिका निभाई है वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के भविष्य के लिए तो खतरा है ही स्वयं इन समाजों को भी असुरक्षा, ठहराव और अशांति की ओर ले जाता है। अमेरिकी राजधानी वाशिंगटन में 5 जनवरी को जो हुआ और उसे, जिस तरह से पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता को चुनौती देते हुए, अंजाम दिया गया वह भयावह है।

लगातार, बिना किसी आधार के कहा गया कि ट्रंप की जीत को उनसे चुराया गया है और नस्लवादी एवं धार्मिक घृणा फैलाते हुए जिस तरह सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश की गई वह पूरी अमेरिकी व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। खतरे की बात यह है कि अगर ट्रंप के समर्थकों के खिलाफ इस अराजकता के लिए थोड़ी बहुत कानूनी कार्रवाई होती भी है तो भी इस अराजकता के सिरमौर को शायद ही कुछ हो पाए। इस अर्थ में कि ट्रंप जिन हितों के प्रतिनिधि हैं, पूरी रिपब्लिकन पार्टी और उसके बाहर भी ऐसी ताकतें हैं जो समानता और उदारता को स्वीकार नहीं करतीं।

भारतीय व्यवस्था में भी ये चारित्रिक गुण बहुत गहरे हैं। जातिवाद और उससे हजारों वर्षों से लाभान्वित होते आ रहे एक प्रभावशाली वर्ग को, जो लगभग समाज के सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों (सत्ता से लेकर ज्ञान तक) में कथित प्रतिभा के बल पर युगों से जमा हुआ है और जिसे पहली बार पिछले सात दशकों में चुनौती मिली थी, उसे यह बात स्वीकार नहीं है कि सत्ता में उसके साथ किसी और वर्ग/जाति की भागीदारी हो। एक तरह से भारतीय समाज का यही हिस्सा आजादी के बाद पहली बार भाजपा को केंद्रीय सत्ता में इतनी मजबूत पकड़ के साथ बैठाने में सफल हुआ है, पर चिंता की बात यह है कि भारतीय समाज में, बल्कि कहना चाहिए उसके सत्ताधारी वर्ग में, कम से कम आज, कोई ऐसा दृष्टिवान नेता या दल नजर नहीं आ रहा है जो इस प्रतिगामी मानसिकता को तोड़ सके और हमारे इस सात दशक पुराने, तीसरी दुनिया के देशों के लिए आदर्श, लोकतंत्र को एक स्वस्थ और समता वाले समाज की दिशा में फिर से मोड़  सके।

देखने की बात यह है कि इन दोनों ही देशों में चुनावों के दौरान पैसा ऐसे स्रोतों से आया जिन्हें नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता। पर अमेरिका में इसके बावजूद सत्ता परिवर्तन हो गया। अब सवाल भारत का है जहां अभी तीन साल और वर्तमान सत्ताधारियों को रहना है। निश्चय ही विगत साल सालों में इस सरकार ने कई मनमाने और जन विरोधी निर्णय लिए हैं पर उसे विरोध पक्ष चुनौती नहीं दे पाया है। बल्कि पिछले चुनाव में तो वह अंधराष्ट्रवाद के सहारे और भी ताकतवर होकर उभरा है। पर इधर उसे किसानों से जो चुनौती मिल रही है वह अप्रत्याशित नहीं है। इसके पीछे इस सरकार के नेतृत्व की मनमानी है जो किसी भी लोकतांत्रिक संस्था और मूल्यों का सम्मान नहीं कर रही है। अगर उसने ऐसा किया होता तो उसे आज किसानों से जो चुनौती मिल रही है वह न मिली होती। पर दिक्कत यह है कि सरकार अब भी यह मान कर चल रही है कि वह अपने हथकंडों – पुलिस, गुप्तचर, आयकर और गोदी मीडिया की तिकड़मों और झूठों के बल पर किसी को बोलने नहीं देगी। पर विगत ढाई महीनों से चल रहे किसानों के कृषि संबंधी कानूनों के विरोध ने सरकार के छक्के छुड़ा दिए हैं।

आगे क्या होगा, इसका अनुमान लगाना अब ज्यादा मुश्किल नहीं रहा है। किसानों का दमन उसे निश्चित ही महंगा पड़ेगा यह उसे 26 जनवरी की घटनाओं से समझ आ गया होगा। इससे आगे यह आंदोलन गांव-गांव तक पहुंचेगा और तब इसके राजनीतिक और आर्थिक परिणाम घातक हो सकते हैं। 6 जनवरी को वाशिंगटन में जो हुआ और अब दिल्ली में जो हो रहा है उसमें किसी तरह की समानता नहीं देखी जा सकती पर इससे एक बात समझ में आती है कि अक्सर हताश या आत्ममुग्ध राजनीतिक नियमों, मूल्यों और परंपराओं की अनदेखी कर अपने लिए बड़े राजनीतिक संकट पैदा करते हैं। सरकार के लिए घातक होने से जो माहौल बना है उससे उन प्रमाणों को परखना आसान हो गया है जो डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की सफलता और उनकी मनमानी को, एक हद तक ही सही, उजागर कर देते हैं।

बात डोनाल्ड ट्रंप से करते हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह कई ”झूठी और भ्रामक बातें करते हैं।‘’ रियल एस्टेट के धंधे में लगे इस व्यक्ति की कुल संपत्ति फोर्ब्स के मुताबिक तीन हजार एक सौ करोड़ डॉलर की है। स्तंभकार माइकेल हिल्टजिक ने लॉस एंजलिस टाइम्स  के अपने लेख (17 जनवरी) की शुरुआत जिस तरह से की है वह देखने लायक है। उन्होंने लिखा है : ”अमेरिकी राजनीति के बारे में एक अकेला सत्य जो सब कुछ समेट लेता है यह है कि सही उम्मीदवार पर पूंजी लगाना भरपूर मुनाफा देता है।‘’

हिल्टजिक ने आगे बतलाया है कि इस तथ्य कि पुष्टि, जिन लोगों ने ट्रंप के पिछले चुनाव प्रचार में पूंजी लगाई थी, ट्रंप द्वारा पहुंचाए गए लाभ से होती है। लेख के अनुसार, रियल एस्टेट (यानी प्रापर्टी के) धंधे, प्राइवेट इक्विटी या तेल और गैस उद्योग को ट्रंप की करों में कटौती और सरकारी नियंत्रण को खत्म (डिरेगुलेटरी) करने की नीतियों से आशातीत फायदा हुआ।

अमेरिकी केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार, 2019-20 में ट्रंप विजय कोष में अंशदान करने वालों में केल्सी सी वारन ने 22.5 लाख डालर, जुवाघर चलाने वाले स्टीव विन ने 15 लाख डालर, फिलरुफिन ने 13 लाख 80 हजार डालर और शेलडन एडलसन ने 11 लाख 60 हजार डालर दिए। हिल्टजिक के अनुसार कुल 63 अमेरिकियों ने जो एक अरब डॉलर या उससे अधिक संपत्ति के मालिक थे 33 अरब तीस करोड़ डालर ट्रंप विजय कोष में दिए थे। ये आंकड़े इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं कि ये इस बात के प्रमाण हैं कि लोकतंत्र किस कदर महंगा सौदा हो गया है और पूंजीपति लोग उसे कैसे नियंत्रित करते हैं। यह बात भारतीय संदर्भ में भी लागू होती है। कैसे इस पर आगे चर्चा करेंगे। जिन पूंजीपतियों ने नरेंद्र मोदी के चुनाव में अपनी तिजोरियां खोल दीं थीं वह यूं ही नहीं किया गया था। अब उसे चुकाने का समय आ गया है। अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो अगले चुनाव में उनकी जगह वह उम्मीदवार होगा जो उनकी मंशाओं के अनुसार चल सके। (कृषि कानून इसी समीकरण का परिणाम है।)

हिल्टजिक ने अपने निष्कर्षों में एक बात यह कही है कि ”मुद्दा यह है कि अमेरिका की संपत्ति की असमानता सामाजिक और लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर कर रही है, नस्ल और धार्मिक भेदभाव, आव्रजकों के प्रति घृणा और गरीबों के प्रति दया का क्षरण कर रही है।‘’

अब रही बात भारत की। ये बातें भारत पर किस हद तक लागू होती हैं? याद कीजिए गत वर्ष के शुरू में लागू किए गए लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के साथ क्या हुआ था? उससे पहले विमुद्रीकरण के बाद क्या हुआ था? दोनों ही निर्णय जिस सनकीपने से लिए गए उसकी कीमत आम जनता को चुनानी पड़ी थी। सच तो यह है कि लॉकडाउन के दुष्परिणामों का अभी अपने पूरे आकार में सामने आना बाकी है।

गत माह के अंत में प्रसारित ऑक्सफैम की रिपोर्ट क्या कहती है? कि उस दौर में जब लोग रोटी के लिए मोहताज हो गए थे भारत जैसे गरीब देश के पूंजीपति 90 करोड़ रुपए प्रति घंटे की रफ्तार से कमा रहे थे। रिपोर्ट में जिस पूंजीपति का नाम है वह है मुकेश अंबानी। यानी इस दौरान उन्हें जो थोड़ा बहुत नुक्सान हुआ था उसकी भरपाई करने में देर नहीं लगी बल्कि अकूत लाभ भी हुआ।

मोदी सरकार के समानांतर सफलता की ऊंचाइयां छूने वाले एक गुजराती सज्जन का नाम इस बीच लिया जा रहा है, वह हैं गौतम अडानी। गौतम अडानी और नरेंद्र मोदी की दोस्ती पुरानी है। यह बात सही है कि इस समय देश के सबसे समृद्ध व्यक्ति मुकेश अंबानी हैं जिनकी संपत्ति में 2014-2019 के दौरान 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। दूसरे शब्दों में उनकी संपत्ति 1.68 लाख करोड़ से बढ़कर 3.65 लाख करोड़ हो गई थी। जहां तक गौतम अडानी का सवाल है 2014 में उनकी कुल संपत्ति 50.4 हजार करोड़ थी जो 2019 में बढ़कर 1.1 लाख करोड़ हो गई। यानी उनकी संपत्ति में 121 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वृद्धि की यह दर अंबानी से तीन प्रतिशत ज्यादा है।

फोर्ब्स के अनुसार, गत वर्ष जब देश कोविड-19 से पीड़ित था, देश के सबसे समृद्ध सौ में से आधे लोगों की आय में 14 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो 517.5 अरब डालर की थी। इस साल गौतम अडानी की संपत्ति में 61 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अडानी का करोबार मूलत: बंदरगाह और विशेष आर्थिक क्षेत्र, बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और गैस में रहा है। जब सरकार ने देशभर में तेल और गैस वितरण के लिए 126 केंद्र बनाने के लिए टेंडर निकाले तो इनमें से अकेले अडानी को 25 ठेके मिले।

यहां यह नहीं भुलाया जा सकता कि इसी दौरान प्रति मिनट एक लाख 70 हजार लोगों की नौकरियां जा रही थीं। ऑक्सफैम के अनुसार, आम लोगों को सामान्य स्थिति में आने के लिए कम से कम दस साल लगेंगे।  

नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के शासन के दौरान चुनाव के लिए कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा किए जाने वाले अंशदान के नियमों में परिवर्तन किए गए और कंपनियों की ओर से दी जाने वाली कुल राशि को पांच प्रतिशत से बढ़ाकर साढ़े सात प्रतिशत कर दिया गया। अब तक जो विदेशी कंपनियों से राजनीतिक दलों के लिए योगदान पर पाबंदी थी उसे खत्म कर दिया गया। एलक्टोरल ट्रस्ट और एलक्टोरल बॉन्ड निकाले गए। इन सबने कुल मिलाकर भाजपा को लाभ पहुंचाया। जैसे कि वर्ष 2017-18 में भाजपा को कॉरपोरेट क्षेत्र से मिलने वाले कुल फंड का 92 प्रतिशत मिला। भाजपा को मिलने वाली यह राशि जहां चार सौ करोड़ थी, वहीं कांग्रेस को सिर्फ 19 करोड़ मिले थे। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्मस के अनुसार, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 2004-2014 के दौरान जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भी भाजपा को ज्यादा फंड मिले।

स्पष्ट है कि भारतीय पूंजीपतियों ने तय कर रखा था कि वह किस तरह का प्रधानमंत्री चाहते हैं। वे कांग्रेस के ‘समाजवादी एजेंडे’ से संतुष्ट नहीं थे और ऐसा आदमी चाहते थे जो तेजी से उदारीकरण की नीतियों को अपनाए। इस रोशनी में देखें तो कृषि के निजीकरण का मसला समझ में आ जाता है। अडानी समूह द्वारा दो-दो लाख टन अनाज स्टोर करने वाले सैलो पंजाब, हरियाणा के अलावा देश के उन अन्य सभी प्रदेशों में भी बनाए गए हैं जहां कृषि बड़े पैमाने पर होती है। यद्यपि इधर इन्हें भारतीय खाद्यान्न निगम के लिए निर्मित बतलाया जा रहा है। इसलिए फिलहाल यह कहना गलत होगा कि वे कृषि व्यवसाय को भारतीय किसानों से मुक्त करके बड़ी कंपनियों के हाथ में देने के लिए किया गया है। पर अगर वह कानूनों के मुताबिक पूंजीपतियों के हाथ में चली जाए तो कोई सरकार क्या कर सकती है!

(समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट का संपादकीय लेख जो पत्रिका के फरवरी अंक में प्रकाशित हुआ है।)

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This post was last modified on February 13, 2021 11:43 am

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