Monday, December 5, 2022

आलोचना से परे नहीं है न्यायपालिका 

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2014 के बाद देश की राजनीति में ही नहीं, बल्कि न्यायपालिका में भी, कुछ ऐसे परिवर्तन आए हैं, जिन पर लोगों का ध्यान गया है। न्यायपालिका किसी राजनीतिक विचारधारा और सत्ता की राजनीति से प्रेरित होकर काम नहीं करती है, बल्कि वह कानून और संविधान को केंद्र में रख कर अपने फैसले देती है। पर यदि उसके फैसले में रंचमात्र भी राजनीति से प्रेरित, कोई तथ्य या अंश, दिखता है तो, वह सीधे जनता के निशाने पर आ जाती है। तीस्ता सीतलवाड और हिमांशु कुमार के बारे में किए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और नूपुर शर्मा केस में अदालत के मौखिक टिप्पणियों के बाद सुप्रीम कोर्ट सीधे आलोचना के केंद्र में आ गया। आज सोशल मीडिया के युग में, कोई भी संस्था यदि यह सोचती है कि उस पर जनता की निगाह नहीं जाएगी और उसके कृत्यों पर बहस नहीं होगी तो वह बेहद गलतफहमी में है और अब ऐसा नहीं होने जा रहा है। 

जब सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई रंजन गोगोई, अवकाश ग्रहण के कुछ समय पश्चात, राज्यसभा के लिए नामांकित हुए तो, इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिये एक अच्छी परंपरा नहीं मानी गयी। कानूनी रूप से रिटायर होने के बाद कोई भी जज, सार्वजनिक जीवन में जा सकता है, वह विधायिका का सदस्य बन सकता है और मंत्री भी बन सकता है, पर रंजन गोगोई अपने रिटायर होने के पहले जिस तरह के मुकदमों, उदाहरण के लिए, राफेल घोटाला और सीबीआई प्रमुख के स्थानांतरण सम्बन्धी मामले की सुनवाई कर रहे थे और जैसे उन्होंने इन केसों का निपटारा किया, उसे लेकर उनका राज्यसभा में हुआ नामांकन आलोचना के घेरे में स्वाभाविक रूप से आ गया।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जस्टिस रंजन गोगोई उन चार जजों के समूह में शामिल थे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट की साख के सवाल पर, देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार, एक खुली प्रेस कांफ्रेंस की थी। यह भी एक विडंबना है कि, साख के सवाल पर सार्वजनिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस करने वाले रंजन गोगई को जब सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा बरकरार रखने का अवसर मिला तो देश के न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में, विफल रहे।

जस्टिस रंजन गोगोई के रिटायर होने के बाद जस्टिस बोबडे देश के नए सीजेआई बने। जस्टिस बोबडे का कार्यकाल सामान्य रहा पर उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने कोई ऐसा फैसला नहीं दिया जो देश के न्यायिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जा सके। जस्टिस बोबडे के बाद जस्टिस एनवी रमना सीजेआई बने और जस्टिस रमना के शुरुआती तेवरों से लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट अपनी गरिमा, को बचाये रख सकता है। सीजेआई जस्टिस एनवी रमना 26 अगस्त 2022 को रिटायर होने वाले हैं और सुप्रीम कोर्ट की स्थापित परंपरा के अनुसार, जस्टिस एनवी रमना के रिटायरमेंट के बाद जस्टिस यूयू ललित सीजेआई बनेंगे। जस्टिस रमना सार्वजनिक व्याख्यानों में अक्सर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा को लेकर मुखर रहते हैं पर ऐसी मुखरता या स्पष्टवादिता जब तक अदालत के किसी फैसले में न दिखे, एक निजी विचार बन कर ही रह जाती हैं। फिर भी जस्टिस रमना के कार्यकाल में कुछ महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय फैसले हुए हैं जिनका उल्लेख करना समीचीन होगा। 

1. देशद्रोह का मामला 

सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए (सेडिशन) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका दायर की थी। केदारनाथ केस में सुप्रीम कोर्ट यह व्यवस्था पहले भी दे चुका है कि केवल भाषण देने से सेडिशन या देशद्रोह का अपराध नहीं होता है, बल्कि इसके लिए हिंसक तैयारी या गतिविधियां भी होनी चाहिये। अंत में सरकार ने अदालत में यह हलफनामा दायर कर के कहा कि, सरकार, इस कानून पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार है तब सरकार ने यह ऐतिहासिक आदेश सुनाया कि, जब तक सरकार, इस मामले पर पुनर्विचार नहीं कर लेती सेडिशन के मामले दर्ज नहीं किये जा सकेंगे। सुनवाई के दौरान, सीजेआई रमना ने कानून के दुरुपयोग और कार्यपालिका की ओर से जवाबदेही की कमी के बारे में चिंता व्यक्त की।

2. त्रिपुरा हिंसा 

त्रिपुरा राज्य में हिंसा होने पर, वहां इस संबंध में सोशल मीडिया में कुछ टिप्पणियां करने वाले दो अधिवक्ताओं और एक पत्रकार को, जस्टिस रमना ने गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की। यह मामला, अक्टूबर 2021 में, त्रिपुरा में हुए सांप्रदायिक दंगों के बारे में उनके सोशल मीडिया पोस्ट के संबंध में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, यूएपीए के तहत उनके खिलाफ दर्ज मुक़दमे से जुड़ा था। 

3. लखीमपुर खीरी हत्याकांड 

 सीजेआई की अगुवाई वाली पीठ ने हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा को दी गई जमानत को रद्द कर दिया। आशीष मिश्रा लखीमपुर खीरी हिंसा का मुख्य आरोपी था, जिसमें उसके वाहन से कथित तौर पर कुचलने के बाद आठ लोगों की मौत हो गई थी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि पीड़ितों को ठीक से नहीं सुना जा रहा है और मुल्जिम को जमानत देने में उच्च न्यायालय द्वारा जो जल्दीबाजी दिखाई गई उससे कई संदेह उपजते हैं और यह जमानत आदेश, रद्द करने के योग्य है। मुल्ज़िम अभी जेल में ही है।

यह कुछ उदाहरण हैं जिनसे यह लगता है कि, जस्टिस एनवी रमना ने कुछ महत्वपूर्ण मामलों को उठाने और उन्हें निपटाने के प्रयास किए हैं, लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट देखें तो इससे पता चलता है कि, अभी भी संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण, लगभग 422 मामले लंबित हैं। इन 422 मामलों में से 52 मामले अति महत्वपूर्ण श्रेणी के हैं जिनमें जम्मू कश्मीर से जुड़ा अनुच्छेद 370 के संशोधन का मामला भी है। अब जबकि जस्टिस रमना 26 अगस्त, 2022 को अवकाश ग्रहण कर रहे हैं तो क्या अब केवल इन्हीं डेढ़ महीनों में, इन महत्वपूर्ण मामलों को वे सुन पाते हैं या इन्हें वे अगले सीजेआई के लिए लंबित छोड़ जाएंगे। मैं जानबूझकर तीस्ता सीतलवाड, हिमांशु कुमार, नूपुर शर्मा आदि के मामले जो अभिव्यक्ति के अधिकार और नागरिक अधिकारों से जुड़े हैं पर कोई चर्चा नहीं कर रहा हूं, क्योंकि उनके लिए, एक अलग से लेख लिखा जाना,  उचित होगा। 

अब संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण कुछ मामलों की चर्चा करते हैं जो, शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित हैं, जिनमें से कुछ पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है।

1. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को चुनौती 

दिसंबर, 2019 में पारित नागरिकता (संशोधन) अधिनियम ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने की बात कही है, और इसमें मुसलमानों को नागरिकता के लिए आवेदन करने से बाहर कर दिया गया है। अभी तक इसकी नियमावली नहीं बनी है। सीएए का विरोध करने वाले लोगों का मानना है कि यह भारतीय जनता पार्टी की भारतीय मुसलमानों की नागरिकता छीनने की योजना का हिस्सा है। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इस संबंध में, लगभग 150 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई हैं। शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2019 में नोटिस जारी किया था लेकिन मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। तब से इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है। मामला दो साल से लंबित है। संविधान के मूल सिद्धांत धर्म निरपेक्षता को चुनौती देते हुए इस अधिनियम के बारे में शीर्ष कोर्ट की खामोशी चिंतित करने वाली है। 

2. अनुच्छेद 370

अगस्त 2019 में, अनुच्छेद 370 और 35A में संशोधन करके, जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन राज्य को एक विशेष दर्जा प्रदान करने वाले प्रावधानों को रद्द कर दिया गया था। इस संशोधन को चुनौती देने वाली पहली याचिका,  9 अगस्त, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के सामने दायर की गई थी। इस मामले की सुनवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे और न्यायमूर्ति नज़ीर ने 28 अगस्त को की थी, जिन्होंने तब मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था। इस मामले को सात जजों की बेंच को रेफर करने की भी बात हुई थी, लेकिन पांच जजों की बेंच ने 2020 में कहा था कि मौजूदा मामले में सात जजों की बेंच बनाने की जरूरत नहीं है। मामला तब से अभी तक लंबित है।

अब सीजेआई रमना ने कहा कि वह जल्द ही इस मामले को उठाएंगे। 25 अप्रैल को वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफड़े ने सीजेआई जस्टिस रमना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की कवायद शुरू हो गई है। इस पर सीजेआई, जस्टिस रमना ने कहा कि मामला पांच जजों की बेंच के पास है और उन्हें उनसे पूछना होगा, क्योंकि उनमें कुछ के रिटायरमेंट भी होने वाले हैं। अभी के लिए, उन्होंने कहा है कि गर्मियों की छुट्टी के बाद मामले को उठाया जा सकता है। जुलाई में सुप्रीम कोर्ट गर्मियों की छुट्टी के बाद खुलेगा, तब यह पता चलेगा कि अदालत इस मामले में सुनवाई करती है या नहीं।

3. चुनावी बांड योजना 

चुनावी यानी इलेक्टोरल बांड योजना को 2 जनवरी, 2018 को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया था। एक चुनावी बांड एक वचन पत्र की तरह है, जो मांग पर वाहक को देय एक राशि प्रदान करने का साधन है। राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए भारत में निगमित व्यक्ति या निगम द्वारा, चुनावी बांड का उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान चुनावी बांड योजना को वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा पेश किया गया था, जिसने उक्त योजना को लागू करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, आयकर अधिनियम और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया गया।

वित्त अधिनियम द्वारा, चुनावी फंडिंग के उद्देश्यों से, किसी भी अनुसूचित बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले चुनावी बांड की एक प्रणाली लाई गई। चूंकि इस क़ानून को धन विधेयक के रूप में पारित किया गया था, इसलिए राज्यसभा की सहमति को दरकिनार कर दिया गया था। इस कदम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस योजना की मुख्य चुनौती यह है कि इसे धन विधेयक के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए था क्योंकि यह बजट या कर का कोई अंश नहीं है बल्कि यह पॉलिटिकल फंडिंग के लिए चुनाव सुधार का एक उपक्रम था। लेकिन इसमें पारदर्शिता का भी अभाव है। 

अदालत ने 2020 में मामले की संक्षिप्त सुनवाई की और चुनाव आयोग को इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाने की मांग वाली अर्जी पर जवाब देने के लिए समय दिया। बाद में 2021 में, जस्टिस रमना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने चुनावी बांड पर अंतरिम रोक लगाने के लिए अधिवक्ता प्रशांत भूषण को सुना। कोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। तब से मामला लटका हुआ है।

4. कर्नाटक हिजाब मामला 

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कर्नाटक उच्च न्यायालय के एक फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें उच्च न्यायालय ने एक सरकारी आदेश को बरकरार रखा था जो पूरे कर्नाटक में स्कूलों में लड़कियों के हिजाब पहनने पर प्रभावी रूप से प्रतिबंध लगाता है। अंतरिम चरण में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहली बार एक याचिका दायर की गई थी, जब कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया था, जब तक कि मामला उसके समक्ष लंबित नहीं है, तब तक स्कूलों के अंदर सभी धार्मिक वस्त्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। 

स्कूली लड़कियों द्वारा अंतरिम आदेश पर रोक लगाने की मांग करते हुए याचिका दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि यह उनके समानता के अधिकार, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार और अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदान किए गए सम्मान के साथ जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट का विचार था कि इस मामले में अंतरिम स्तर पर हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। बाद में जब उच्च न्यायालय ने सरकारी आदेश को बरकरार रखा तो याचिकाकर्ताओं ने इसे चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया।  इस मामले का उल्लेख सीजेआई रमना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष किया गया, जिन्होंने मौखिक रूप से कहा कि होली की छुट्टियों के बाद मामले को उठाया जाएगा।  हालांकि, अभी तक इस मामले को नहीं उठाया गया है।

5. मणिपुर न्यायेतर हत्याएं 

सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच जस्टिस एम.बी.  लोकुर ने जुलाई 2017 में एक महत्वपूर्ण आदेश में भारतीय सेना, असम राइफल्स और मणिपुर पुलिस द्वारा वर्ष 2000 और 2012 के बीच मणिपुर में फर्जी एनकाउंटर यानी एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्याओं के कथित 1,528 मामलों की केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने को कहा था। दिसंबर 2018 में जस्टिस लोकुर की सेवानिवृत्ति के बाद, शीर्ष अदालत ने सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम के तहत लाए गए अशांत क्षेत्र में एक आम नागरिक के जीवन के अधिकार को बनाए रखने के लिए अत्यधिक महत्व के मामले को आगे बढ़ाने के लिए एक नई पीठ का पुनर्गठन करने की बात की है। जुलाई, 2019 में, मामले के याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर एक आवेदन का जवाब देते हुए, तत्कालीन सीजेआई, रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था, “हम पीठ का पुनर्गठन करने का प्रयास करेंगे।”  उस हिसाब से सीजेआई रमना के कार्यकाल के दौरान भी आज तक कोई प्रयास नहीं किया गया है।

लोकतंत्र में लोक सर्वोच्च है, लोकहित सर्वोच्च है और लोक ही लोकतंत्र के केंद्र में है। रघुवीर सहाय की एक कविता में आए ये शब्द, मखमल, टमटम, बल्लम, तुरही, पगड़ी, छत्र, चंवर आदि के साथ दिखने वाला तंत्र लोक के लिए ही है। न्यायपालिका भी उसी तंत्र का एक अंग है। और यह तंत्र लोकतंत्र की आधार किताब संविधान के संरक्षक की भूमिका में है तो, इसे, सबसे महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में माना जाता है। जनता सिस्टम से निराश होकर न्यायपीठ की ओर देखती है और अपनी बात कहती है।

लेकिन जनता जब यह पाती है कि, न्याय प्रदान करने वाली यह सर्वोच्च संस्था, का फैसला, उसके हित के विपरीत है तो, उसकी उंगलियां, न्यायपालिका पर भी उठने लगती हैं, तब यह भी सवाल उठता है कि, क्या न्यायपालिका की आलोचना हो सकती है ? इस बारे में मेरा कहना है कि न्यायपालिका भी आलोचना से परे नहीं है। उसके फैसलों, क्रियाकलाप और गतिविधियों की आलोचना न सिर्फ हो सकती है बल्कि होनी भी चाहिए। पर आलोचना तार्किक और, लोकहित के उद्देश्य से होनी चाहिए। 

हमारे संविधान में सुप्रीम कोर्ट को केवल जटिल और अन्य मुकदमों के निस्तारण के लिए ही, किसी सर्वोच्च संस्था के रूप में नहीं देखा गया है, अपितु, सुप्रीम कोर्ट को देश के संविधान के रक्षक के रूप में देखा है। संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को असीमित शक्तियां देता है। वह न केवल विधायिका द्वारा बनाये गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा कर सकता है बल्कि ऐसे निर्देश भी पारित कर सकता है जो कानून की ही तरह माने जाएंगे। इतनी असीमित शक्ति सम्पन्न सुप्रीम कोर्ट से जनता और देश की यह स्वाभाविक अपेक्षा रहेगी ही, शीर्ष अदालत, न केवल न्यायपूर्ण कार्य ही करे, बल्कि उसके कार्य और फैसले न्यायपूर्ण दिखें भी। इसीलिए, जब अंतिम आश्रय के रूप में सुप्रीम कोर्ट कहीं असफल दिखता है तो वह आलोचना के घेरे में भी आता है। आलोचना और समीक्षा से परे कोई भी नहीं है, सुप्रीम कोर्ट भी नहीं।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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