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Monday, September 20, 2021

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देश की एकता के लिये अभिशाप हैं धर्म और जाति से प्रेरित दंगे

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धर्म के नाम पर हुए उन व्यापक दंगों या नर संहारों को याद रखा जाना चाहिए। उन्हें याद रखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ताकि धर्मान्धता या अन्य पागलपन के दौर में हम, जो अक्सर भूल जाते हैं कि हम एक अदद इंसान भी हैं, उसे न भूलें। सन 84 हमारे आंखों के सामने गुजरा है। तब हम नौकरी में थे और ऐसे हादसे देखे भी और सुने भी। धर्म और जाति से प्रेरित दंगे देश की एकता के लिये अभिशाप हैं।

1984 के दंगों के बाद पंजाब ने आतंकवाद का जो दौर देखा वह अब तक के इतिहास का सबसे दुःखद दौर रहा है। लेकिन वह दौर भी बीत गया। लेकिन उस दौर में जिनके घर के लोग चाहे वे सुरक्षा बलों में रहे हों या निर्दोष नागरिक, उसकी कसक आज भी उनके घर परिवार के दिलों में होगी। मृत्यु का दंश कभी नहीं भूलता, और अगर वह असामयिक और अपराधजन्य हो तो उसकी टीस जीवन भर सालती रहती है। दंगों में होने वाली मौतें ऐसी ही होती हैं। 

कहते हैं ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण आहत दो सिख सुरक्षा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी थी। ऑपरेशन ब्लू स्टार, अमृतसर में दरबार साहिब में फौजी ऑपरेशन का नाम था। दरबार साहिब, जरनैल सिंह भिंडरावाले के आतंकी साथियों की पनाहगाह बन गया था। अंदर ऐसे आतंकियों का कब्ज़ा हो गया था जो पूरे पंजाब के लिये खतरा बन गए थे। उसी दरबार साहब में एक डीआईजी की जब वे दर्शन करने जा रहे थे तो उनकी हत्या कर दी गयी थी। तब सेना ने अंदर से भिंडरावाले और उसके साथियों को निकाल बाहर करने के लिये यह ऑपरेशन किया था। 

इस ऑपरेशन में भिंडरावाला तो मारा ही गया, साथ ही, अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, 493 आतंकी और अन्य नागरिक भी मारे गए थे। इस ऑपरेशन का नेतृत्व ले.जनरल के सुंदरजी ने किया था। यह घटना सिख समाज को आहत करने वाली थी। इसका असर भी बहुत व्यापक पड़ा। न केवल इस कारण इंदिरा गांधी की हत्या हुयी बल्कि रामगढ़ स्थित सिख लाइट इन्फैंट्री में विद्रोह भी हुआ, जिसे समय रहते नियंत्रित कर लिया गया। 31 अक्तूबर को इंदिरा गांधी की हत्या होती है और पहली नवम्बर की शाम तक दिल्ली में सिख विरोधी दंगे भड़क उठते हैं। यह बिल्कुल इकतरफा दंगे थे और इन दंगों में सरकारी सूचना के अनुसार 3,500 लोग मारे गए थे। हालांकि गैर सरकारी सूत्र यह आंकड़ा 8 हजार से 10 हजार के बीच बताते हैं। देश भर के कुल 40 शहर इन दंगों से प्रभावित रहे। 

मैं 1984 में चुनार में सीओ चुनार था। चुनार, मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो बनारस से लगा हुआ है। अचानक 2 नवम्बर की सुबह-सुबह मेरे इंस्पेक्टर केसी मिश्र मेरे आवास पर आए और उन्होंने कहा कि, सर बनारस में बड़ा बवाल हो गया है और वहां लोग सरदारों को मार रहे हैं और उनकी दुकान जला रहे हैं। पहले तो हैरानी हुई कि, यह कैसा दंगा ? हम सब तो हिंदू मुस्लिम दंगे देखने और सुनने के आदी थे पर यह तो बिल्कुल ही एक नयी बात थी।

तब थानों में फोर्स कम रहती थी और अतिरिक्त फोर्स मुख्यालय से ही मांगने से मिलती थी। सुबह के 5 बज रहे थे। मैं चुनार तहसील कैम्पस में ही बने एक आवास में रहता था और मेरे बगल में ही एसडीएम का आवास था। मेरे साथ एसडीएम वर्मा जी थे जो नौकरी में मुझसे सीनियर थे। तब फोन जैसी सुविधा कम ही थी। मैंने इंस्पेक्टर साहब से कहा कि, वे एसडीएम साहब को भी यह सब बता दें तब तक मैं दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर एसडीएम साहब के ही यहां आ जाता हूँ। फिर इंस्पेक्टर साहब, एसडीएम आवास की तरफ चले गए और मैं तैयार होने चला गया।

थोड़ी देर में जब मैं वर्दी पहने बाहर आया तो देखा कि एसडीएम साहब और इंस्पेक्टर साहब मेरे घर के लॉन में चहलकदमी कर रहे थे। हम तीनों आकर ड्राइंगरूम में बैठ गए। एसडीएम साहब ने तहसीलदार को भी बुला लिया और तब हमने इंस्पेक्टर साहब से पूछा कि अब क्या किया जाना चाहिए। इंस्पेक्टर साहब ने कहा कि पूरे चुनार में लगभग 20 परिवार ही सिख हैं, जिन्हें अगर चुनार के किले में स्थित पुलिस ट्रेनिंग स्कूल के बैरक और आवास में कुछ दिनों के लिये रख दिया जाए तो ठीक होगा। कम से कम इनके साथ कोई हादसा तो नहीं होगा। फिर इनके घर मकान और दुकानों के लिये कुछ फोर्स लगा दी जाएगी। हमें उनकी बात जमी। अब एसडीएम साहब ने कहा कि आप तब तक पीटीएस के कमांडेंट साहब से बात कर यह व्यवस्था देखिए, तब तक मैं तैयार होकर डीएम साहब से संपर्क करता हूँ।

इसके बाद ही मिर्जापुर मुख्यालय से हमारे एसपी साहब का फोन आ गया। उन्होंने भी स्थिति की गम्भीरता बताई और उनके फोन से ही यह जानकारी मिली की दिल्ली, कानपुर आदि शहरों में बड़े दंगे शुरू हो गए हैं। मैं सीधे चुनार के किले में जहां पीटीएस था वहां पहुंचा और सुबह के 8 बज रहे थे तो सीधे ही कमांडेंट आवास पर ही चला गया। कमांडेंट साहब को सारी बात बताई गई और उन्होंने तुरंत ही क्वार्टर मास्टर को बुला लिया और कहा कि आज कल कोर्स तो चल नहीं रहा है, जितनी ज़रूरत हो बैरक खुलवा दीजिए और मेस भी चालू करा दीजिए। मैं यह सब इंतज़ाम कर के सीधे चुनार थाने पर आया और फिर इंस्पेक्टर साहब से कहा कि आप अब सबको किले में भेजने और वहां रुकने की व्यवस्था कीजिये। यह कह कर मैं फिर सीधे एसडीएम साहब के यहां आ गया। उन्हीं के यहां नाश्ता कर के हम दोनों अपने दफ्तर में आ गए। एसडीएम और सीओ के दफ्तर साथ ही साथ थे।

दोपहर तक जब तक कस्बे में सबको कुछ पता चलता, सारे सिखों के परिवार किले में पहुंच गए थे और उनके घरों तथा दुकान की सुरक्षा व्यवस्था हो गयी थी। शाम तक कस्बे के कुछ गणमान्य लोगों को जब यह सब पता चला तो उनमें से कुछ लोग मेरे पास आये और कहा कि यह तो हम सबके प्रति एक अविश्वास करना हुआ, हम सब यह भरोसा दिलाते हैं कि चुनार में ऐसा कुछ नहीं होगा। उनको देश भर से जो खबरें आ रही थीं बताया गया और कहा गया कि कोई असामाजिक तत्व ऐसे माहौल का लाभ उठा कर कोई अपराध न कर दे इस लिये यह इंतज़ाम एहतियातन किया गया है। आप सब किले में जाकर उनसे मिल सकते हैं। उनके घर और उनकी दुकानें कस्बे में ही हैं, उनकी हिफाजत करें। तब तक एसडीएम भी आ गए और फिर सबको समझा कर वापस भेज दिया गया और यहां की स्थिति से डीएम एसपी को भी अवगत करा दिया गया।

3 नवंबर को अचानक मेरी ही सर्किल के एक थाने कछवा में कुछ घटना हो गयी। चुनार से कछवा जाने का रास्ता गंगा नदी को पीपे के पुल से पार कर जाना पड़ता था और कछवा पुलिस सर्किल तो चुनार में था पर वह तहसील सदर में पड़ता था, जिसके एसडीएम गणेश शंकर त्रिपाठी थे जो मिर्जापुर में रहते थे। उन्होंने सुबह सुबह यह खबर भेजी कि आप चुनार से कछवा पहुंचिए और मैं मिर्जापुर से वहां पहुंचता हूँ। दोनों ही थाना कछवा पर मिलेंगे। डेढ़ घंटे में हम दोनों कछवा पहुंच गए और वहां दोपहर में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। हमारे थानाध्यक्ष को यह सूचना थी कि सभा के बाद ही हो सकता है बवाल हो। तब तक बनारस, इलाहाबाद, कानपुर में जगह-जगह कर्फ्यू लग गए थे। जब हर जगह बवाल था तो अतिरिक्त पुलिस मिलती भी कहाँ से। बाद में यह सभा स्थगित करा दी गयी और कस्बे की ही सारी दुकानें बंद करा दी गयीं। लोग आक्रोशित होकर थाने आये। थाना कैम्पस में ही एक शोक सभा आयोजित की गयी। इन्दिरा जी के एक चित्र पर माल्यार्पण हुआ और कुछ लोगों ने भाषण दिए। एक घंटे में यह कार्यक्रम खत्म करा कर रात होते होते बाजार खाली करा दिया गया।

4 नवंबर को बनारस से सारे अखबार आये तब जाकर इस दंगे की भयावहता का पता लगा। मिर्जापुर एक छोटा शहर है और चुनार तो एक कस्बा ही है। अब ज़रूर कुछ जनसंख्या बढ़ गयी होगी। वहां कोई ऐसी बड़ी घटना इसलिए भी नहीं हुई कि लोग भी काफी समझदार थे और लोगों मे आपसी प्रेम भी था। लेकिन जब मैं दो साल बाद 1986 में कानपुर स्थानांतरित होकर आया तब इस दंगे की भयावहता के चिह्न दिखे और लोगों से किस्से सुने। यूं तो यह खबर अखबारों में भी आ चुकी थी कि, दिल्ली, कानपुर और बोकारो में सबसे अधिक हिंसा और लूटपाट हुयी थी। इन सबकी जांच के लिये जस्टिस रंगनाथ मिश्र जांच आयोग भी बैठा था। मैं जब कानपुर पहुंचा तो जस्टिस रंगनाथ मिश्र न्यायिक जांच आयोग का काम खत्म हो चुका था और आयोग ने दंगों से जुड़े मुकदमों की तफ्तीश करने के लिये एक प्रकोष्ठ का गठन किया था, जिसमें कुछ इंस्पेक्टर और सब इंस्पेक्टर थे जो इन मुकदमों की तफ्तीश कर रहे थे।

27 जुलाई, 1986 को मैं कानपुर पहुंचा और वहां मुझे सीओ स्वरूपनगर बनाया गया। साथ ही 1984 के दंगों में दर्ज मुकदमों की तफ़्तीशों के लिए गठित सेल का प्रभारी भी। अधिकतर मुकदमे निपटाए जा चुके थे। कुछ शेष थे। इसके अलावा पुलिस दुर्व्यवहार की कुछ जांचें थीं। इन जांचों के दौरान मुझे कानपुर के सिख समाज से बहुत मिलना जुलना हुआ और उनसे जब उन दंगों के बारे में पूछताछ की गयी तो ज्ञात हुआ कि जितनी भयावहता का अनुमान मैं लगा रहा था, दंगे उससे कहीं अधिक भयावह थे। जले हुए घर, लुटी दुकानें और अपने प्रिय परिजनों को खोए हुए सिख परिवार, अपनी बर्बादी और दुःख की कहानी बताते बताते उदास तो हो जाते थे, पर उनकी जिजीविषा बची थी। कम से कम सत्तर अस्सी सिख परिवारों में जाने और उनसे मिलने का अवसर मुझे मिला और वे सभी समृद्ध कारोबारी थे। मैंने सोचा, क्या नियति है। 1947 के बंटवारे को झेल कर ये परिवार अभी अपने जीवन को सुव्यवस्थित कर के तरक़्की की राह पर चढ़ ही रहे थे कि फिर उन्हें यह हादसा झेलना पड़ा। पर यह भी समझ में आ गया कि संकटों के इस झंझावात से जूझने की गजब की क्षमता इस कौम में है।

1984 के दंगों में दोषी पकड़े भी कम गए। अधिकतर मुकदमे भीड़ के खिलाफ थे और भीड़ की पहचान मुश्किल से ही होती है। तब न सीसी टीवी कैमरे थे और न ही मोबाइल फोन के कैमरे कि मुसीबतों में कुछ सुबूत मिल सकें। कुछ को लोग पहचान भी रहे थे तो उन्होंने उनके नाम लेने से मना भी कर दिया। पुलिस के पास कुछ के बारे में जानकारी थी पर सुबूत नहीं थे। ऐसे ही जांच कार्य में निकलने पर जब ड्राइवर से बात होती थी तो ड्राइवर ने बताया कि, दंगे के समय, हर तरफ तो आग और धुआं था, यह तय करना मुश्किल था कि किधर पहले जाया जाए। फ्रिज, टीवी, कूलर लूट कर ऐसे घरों में भरे थे जिनके घर बिजली के कनेक्शन तक नहीं थे। बाद में यह मुनादी कराई गयी कि, जिसके घर में लूट का सामान हो वह वापस सड़क पर रख दे। इस मुनादी से लोगों ने काफी सामान सड़क पर फेंक भी दिया। 

धीरे-धीरे सब चीजें सामान्य हो गयीं, पर यह पागलपन का दौर पीड़ित लोगों के मन में कीचड़ सा जम गया था। सिख विरोधी दंगों का कोई इतिहास है भी नहीं और यह दंगे भी अचानक भड़के थे। लेकिन इस अचानक भड़के दंगे में भी लूटपाट और हिंसक गतिविधियां सुनियोजित तरीके से ही हुईं। कुछ बेहद नामचीन लोगों के नाम इन दंगों के भड़काने वालों में शामिल थे, जिनका नामोल्लेख करना अब उचित नहीं होगा। 1987 के बाद यह सारे मुकदमे क्राइम ब्रांच सीआईडी को भेज दिए गए। अधिकतर मामले अंतिम आख्या से ही समाप्त हुए। कुछ में चार्ज शीट लगी भी तो उनमें अभियुक्त छूट गए। अगर कुछ मामलों में सज़ा हुयी भी होगी तो, उनके बारे में मुझे जानकारी नहीं है। 

भीड़ द्वारा लूटपाट और सामूहिक हिंसा के मामलों में अक्सर सज़ा नहीं होती है। इसका एक बड़ा कारण होता है अभियुक्त की पहचान और उसके खिलाफ सुबूतों का न होना। दंगे चाहें  मेरठ, अलीगढ़ मुरादाबाद आदि शहरों के हों या 1984 के सिख विरोधी दंगे या 2002 के गुजरात के दंगे, इन सब में भीड़ द्वारा हिंसा की गई और सब में मुकदमे दर्ज हुए हैं। अधिकतर लोगों को दंगे कराने वालों के बारे में भी पता है, पर जब सब कुछ शांत हो जाता है तो फिर लोग इसे नियति समझ कर भुला देना चाहते हैं।

सिख दंगों की जांच के दौरान मैंने यह अनुभव किया कि, जब लिखित बयान लिए जा रहे थे तो लोग उन नामों को जो असरदार और राजनीतिक रसूख वाले लोग थे, को बताने में संकोच करते थे पर जब कागज़ कलम रख दिया जाता था तो फिर अनौपचारिक रूप से उन सबके नाम वे खुल कर बताते भी थे और उनके द्वारा की गयी हरकतें भी। यह स्थिति तो पुलिस तफ्तीश के समय की है। अब जब यह मुकदमा अदालत में ट्रायल पर जाएगा तो गवाह कितना मज़बूत होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अधिकतर मुकदमों के अदालत से छूटने का यह भी एक बड़ा काऱण है। 

दिल्ली में ही देख लें, जहां सबसे हिंसक दंगे भड़के थे उसके अपराधियों का क्या हुआ? 1984 में सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में दिल्ली की एक अदालत ने 34 साल बाद नवंबर 2018 में, दोषी यशपाल को मौत की सजा और दूसरे दोषी नरेश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। एक और अभियुक्त और कांग्रेस के नेता सज्जन कुमार को भी पहले सज़ा दी जा चुकी है जो अपील में रद्द हो गई। इन आरोपियों को हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, आगजनी व अन्य धाराओं में दोषी करार दिया गया था। लम्बे इंतज़ार के बाद यह सजा, आपराधिक न्याय प्रणाली का एक उपहास ही है। इसी प्रकार कानपुर में भी दंगों के दौरान 127 सिखों की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में बहुत दिनों तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई। बाद में जब एफआईआर दर्ज की गई तो स्टेटस रिपोर्ट में कोई पुख्ता सबूत न होने की बात कह कर केस खत्म कर दिया गया। सिख संगठनों का कहना है कि यह शर्मनाक है कि 127 लोगों की हत्या हो गई और पुलिस को कोई सबूत इन मामलों में नहीं मिला। 

आज जब हम श्रीमती इंदिरा गांधी को उनकी दुःखद और जघन्य हत्या के लिये खालिस्तानी आतंकियों को दोषी ठहराते हैं और वे हैं भी, तो चार पांच दिनों तक चलने वाले इस जघन्यतम एकतरफा दंगे के अपराधियों और उनके अपराध की चर्चा भी की जानी चाहिये। अगर अब भी कोई मुकदमा चल रहा है तो यह उम्मीद की जानी चाहिये कि दोषियों को कानून सज़ा दे। आज के दिन हम कम से कम उन निरीह और मासूम व्यक्तियों को, जिन्हें एक धर्म विशेष का होने के कारण 1 नवम्बर से 5 नवम्बर 1984 तक चुन चुन कर बेहद वहशियाना तरीके से मार डाला गया था, याद किया जाना चाहिये। हमें यह उम्मीद भी करनी चाहिए कि, अब देश मे ऐसा पागलपन न फैले जैसा 1984 के सिख विरोधी दंगों और 2002 के गुजरात दंगों सहित ऐसे ही अन्य दंगों में फैल चुका है। 

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं। और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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