Monday, January 24, 2022

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कोविड महामारी के बाद भी क्या जन स्वास्थ्य बन पाएगा सरकार का प्राथमिक एजेंडा?

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कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर ने जो तबाही मचाई है और जिस प्रकार से तीसरी लहर की आशंका व्यक्त की जा रही है, उसे देखते हुए यह अपरिहार्य हो गया है कि सरकार, जन स्वास्थ्य को प्राथमिकता में वरीयता दे। सुबह के अखबार से लेकर सोशल मीडिया का जायजा लीजिए तो सारे माध्यम शोक समाचारों से भरे पड़े हैं। सरकारी आंकड़ों पर न जाएं, वे कभी भी विश्वसनीय नहीं समझे जाते रहे हैं, और आज भी उनकी विश्वसनीयता सन्देह से परे नहीं है। गंगा यमुना का विस्तीर्ण मैदान, संगम के पास गंगा का विशाल रेतीला पाट अविश्वसनीय रूप से एक बड़े कब्रिस्तान में तब्दील हो चुके हैं। इनमें दफन होने वाले वे लोग हैं जिनके लिये कोई शोक श्रद्धांजलि अखबारों में नहीं छपवायेगा, क्योंकि उनके नसीब में तो कुछ बोझ लकड़ी के भी मयस्सर नहीं रहे। 

देश के संविधान में देश को लोक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिये दो बेहद महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। एक अनुच्छेद 12 से 35 तक के वर्णित मौलिक अधिकार, जो अमेरिकी संविधान से हमने लिया है और दूसरा, अनुच्छेद 37 से 51 तक नीति निर्देशक तत्व। मौलिक अधिकार राज्य के लिये बाध्यकारी हैं जबकि नीति निर्देशक तत्व, एक गाइडिंग सिद्धांत है कि राज्य कैसे नागरिकों का जीवन स्तर सुधार कर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेगा। यह दोनों महत्वपूर्ण प्रावधान, संविधान के मूल ढांचे के अंग हैं। इसी लोक कल्याणकारी राज्य की परिभाषा में जन स्वास्थ्य भी आता है जो आज अचानक एक महामारी की आपदा के कारण प्रासंगिक हो गया है। 

यहीं एक जिज्ञासा उठ सकती है कि, क्या स्वास्थ्य का अधिकार, संविधान में एक मौलिक अधिकार है या नहीं ? 

इसका उत्तर होगा कि, संविधान के अंतर्गत कहीं पर भी, एक मौलिक अधिकार के रूप में, स्वास्थ्य के अधिकार को शामिल नहीं किया गया है। लेकिन अनेक अदालती फैसले ऐसे हैं जो संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या में, उसके अंतर्गत, स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के समकक्ष मानते हैं। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद, 21, नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इसके अतिरिक्त,  संविधान के विभिन्न प्रावधान जगह जगह, जन स्वास्थ्य से संबन्धित, मुद्दों पर नागरिकों के अधिकार और, राज्य के दायित्व की बात करते हैं, पर स्वास्थ्य के अधिकार के रूप में, अनुच्छेद 21 ही है, जो एक मौलिक अधिकार के समान पहचान देता है।

स्वास्थ्य से तात्पर्य, केवल निरोग या बीमार होने पर इलाज की ही सुविधा मिले, ऐसा नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आरोग्यता को समेटे हुए है। किसी भी राज्य के स्वास्थ्य का पैमाना, उसके नागरिकों के स्वास्थ्य के विभिन्न पैरामीटर से आता है। जिसमें हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के अतिरिक्त, नागरिकों की औसत आयु में वृद्धि, पोषण की स्थिति, शिशु मृत्यु दर में कमी, संक्रामक रोगों की स्थिति और उन पर नियंत्रण, आदि है, जिसका आकलन संयुक्त राष्ट्र संघ अक्सर समय समय पर करता रहता है।  स्वास्थ्य, किसी भी देश के विकास के महत्वपूर्ण मानकों में से एक है।

मनुष्य के जीने के अधिकार की जब बात की जाती है तो केवल पेट भर लेना ही पर्याप्त नहीं होता है। जीवन के अधिकार के विषय में मानवीय गरिमा के साथ जीवन यापन की बात कही जाती है। गरिमा को कुछ ही शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। इसके अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण है, स्वास्थ्य और शिक्षा। यह दोनों ही लोक कल्याणकारी राज्य के अभिन्न अंग हैं। गरिमापूर्ण जीने के अधिकार के अंतर्गत, जीवन की अन्य मौलिक आवश्यकताएं, जैसे पर्याप्त पोषण, कपड़े और आश्रय, और विविध रूपों में पढ़ने, लिखने और स्वयं को व्यक्त करने की सुविधा एवं सामाजिकता इत्यादि का समावेश है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 47, ‘पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने के राज्य के कर्तव्य’ के विषय की भी चर्चा करता है। 

लेखक, क्रांति कुमार ने इस विषय पर न्यायालयों के दृष्टिकोण का एक विशद विश्लेषण एक लेख में प्रस्तुत किया है। लेकिन उनके लेख में दिए, अदालतों के पुराने फैसलों की चर्चा करने के पहले, हाल ही में, महामारी से सम्बंधित इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कुछ याचिकाओं का उल्लेख आवश्यक है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने, उत्तर प्रदेश सरकार को हर गांव में दो एम्बुलेंस रखने और आईसीयू जैसी चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने का आदेश दिया और यूपी के हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को राम भरोसे कहा। हाईकोर्ट का यह आदेश भले ही जनहित में दिया गया हो, पर यह आदेश व्यवहारिक नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी। यूपी ही नहीं देश भर में स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर का हाल खराब है और इसका कारण है, स्वास्थ्य के प्रति, सरकार की उदासीनता और जनस्वास्थ्य को सरकार की प्राथमिकता से बाहर रखना है। पर अब सरकार को, चाहिए कि, महामारी की इस भयावह आपदा को देखते हुए, वह अपनी प्राथमिकताओं को बदले और जनस्वास्थ्य के मुद्दे पर अपना ध्यान केंद्रित करे। 

सुप्रीम कोर्ट के कुछ प्रमुख मुकदमों का उल्लेख, यह समझने के लिये जरूरी है कि स्वास्थ्य कैसे अदालत की व्याख्या के अनुसार, मौलिक अधिकारों का अंग बना है। 

● विन्सेंट पनिकुर्लान्गारा बनाम भारत संघ एवं अन्य 1987 AIR 990 के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत  तलाशने का एक महवपूर्ण कदम उठाया था, और यह कहा था कि इसे सुनिश्चित करना, राज्य की एक जिम्मेदारी है। इसके लिए, अदालत द्वारा इस मामले में बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ [1984] 3 SCC 161 का जिक्र भी किया गया था।

● सीईएससी लिमिटेड बनाम सुभाष चन्द्र बोस 1992 AIR 573 के मामले में श्रमिकों के स्वास्थ्य के अधिकार के बारे में टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह कहा था कि “स्वास्थ्य के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत किया गया है, इसे न केवल सामाजिक न्याय का एक पहलू माना जाना चाहिए, बल्कि यह राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के अलावा उन अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के अंतर्गत भी आता है, जिन पर भारत ने हस्ताक्षर किया है।

● कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर बनाम भारत संघ 1995 AIR 922 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह माना गया था कि “संविधान के अनुच्छेद 39 (सी), 41 और 43 को अनुच्छेद 21 के साथ पढ़े जाने पर यह साफ़ हो जाता है कि स्वास्थ्य और चिकित्सा का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करने के साथ-साथ के साथ यह कामगार के जीवन को सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बनाता है।” 

यहाँ अदालत द्वारा मुख्य रूप से कामगार/मजदूरों के स्वास्थ्य के अधिकार को मुख्य रूप से रेखांकित किया गया है, हालाँकि इन मामलों के बाद अदालत ने इस अधिकार को सामान्य रूप से आम लोगों के लिए मौलिक अधिकार के रूप में देखने की शुरुआत कर दी थी।

● पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य 1996 SCC (4) 37 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह साफ़ किया गया था कि इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि लोगों को पर्याप्त चिकित्सा सेवाएं प्रदान करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। इस उद्देश्य के लिए जो भी आवश्यक है उसे किया जाना चाहिए।

अदालत ने इस मामले में यह साफ़ किया था कि एक गरीब व्यक्ति को मुफ्त स्वास्थ्य सहायता प्रदान करने के संवैधानिक दायित्व के संदर्भ में, वित्तीय बाधाओं के कारण राज्य उस संबंध में अपने संवैधानिक दायित्व से बच नहीं सकता है। चिकित्सा सेवाओं के लिए धन के आवंटन के मामले में राज्य की संवैधानिक बाध्यता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

● पंजाब राज्य बनाम मोहिंदर सिंह चावला (1997) 2 SCC 83 के मामले में भी उच्चतम न्यायालय द्वारा यह साफ़ किया जा चुका है कि स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करना सरकार का एक संवैधानिक दायित्व है। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि राज्य अपने प्राथमिक कर्तव्य के रूप में अपने नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार, सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों को खोलकर इस दायित्व का निर्वाह करती भी है, लेकिन इसे सार्थक बनाने के लिए, यह जरूरी है यह अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र लोगों की पहुँच के भीतर भी होने चाहिए।

जहाँ तक संभव हो, अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रतीक्षा सूची की कतार को कम किया जाना चाहिए और यह भी राज्य की जिम्मेदारी है कि वह सर्वोत्तम प्रतिभाओं को इन अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में नियुक्त करे और प्रभावी योगदान देने के लिए अपने प्रशासन को तैयार करने के लिए सभी सुविधाएं प्रदान करे, क्योंकि यह भी सरकार का कर्तव्य है [पंजाब राज्य बनाम राम लुभाया बग्गा (1998) 4 SCC 117)]।

● एसोसिएशन ऑफ़ मेडिकल सुपरस्पेशलिटी अस्पिरंट्स एवं रेसिडेंट्स बनाम भारत संघ के मामले में (2019) 8 SCC 607 में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया था कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 21, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए राज्य पर एक दायित्व को लागू करता है। मानव जीवन का संरक्षण इस प्रकार सर्वोपरि है। इसी मामले में आगे कहा गया कि राज्य द्वारा संचालित सरकारी अस्पताल और उसमें कार्यरत चिकित्सा अधिकारी मानव जीवन के संरक्षण के लिए चिकित्सा सहायता देने के लिए बाध्य हैं।

● अश्विनी कुमार बनाम भारत संघ (2019) 2 एससीसी 636, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने जोर देकर कहा था कि “राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि ये मौलिक अधिकार (स्वास्थ्य सम्बन्धी) न केवल संरक्षित हैं बल्कि लागू किए गए हैं और सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं।”

● तेलंगाना हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय गंटा जय कुमार बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य [Writ Petition (PIL) No. 75 of 2020] में यह कहा था कि मेडिकल इमरजेंसी के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलने की इजाज़त नहीं दी जा सकती जो उन्हें संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिया गया है।

यह मामला COVID 19 की जांच से जुड़ा था, जो कि सरकार द्वारा लोगों को सिर्फ़ चिह्नित सरकारी अस्पतालों से ही COVID 19 की जांच कराने के सरकारी आदेश से सम्बंधित था। न्यायमूर्ति एम. एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति के. लक्ष्मण की खंडपीठ ने इस आदेश को अपने फैसले में ख़ारिज कर दिया।

अदालत ने कहा कि सरकार का यह आदेश, लोगों को जांच के लिए निजी अस्पतालों में जाने की इजाज़त नहीं देता है, जबकि इन अस्पतालों को आईसीएमआर को जांच करने की अनुमति मिली है।

इस मामले में न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार की व्याख्या करते हुए अपने लिए चिकित्सीय देखभाल को चुनने के अधिकार के दायरे का विस्तार किया। यह अभिनिर्णित किया गया कि इस अधिकार के अंतर्गत, अपनी पसंद की प्रयोगशाला में परीक्षण करने की स्वतंत्रता शामिल है और सरकार उस अधिकार को नहीं ले सकती है।

राज्य विशेष रूप से व्यक्ति की पसंद को सीमित करके उसे अक्षम नहीं कर सकता है जब एक ऐसी बीमारी की बात आती है जो उसके या उसके परिजनों के जीवन/ स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

संविधान और संविधान की व्याख्या करने वाली अदालतें, भले ही राज्य को उसके कर्तव्यों और दायित्वों की याद दिलाते रहें कि, एक कल्याणकारी राज्य में यह सुनिश्चित करना राज्य का ही दायित्व होता है कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए परिस्थितियों का निर्माण किया जाए और उनकी निरंतरता को सुनिश्चित किया जाए। जीवन का अधिकार, जो सबसे मूल्यवान मानव अधिकार है और जो अन्य सभी अधिकारों की संभावना को जन्म देता है, उसका संरक्षण किया जाए, पर इसका व्यवहारिक पक्ष अदालती व्याख्या से सदैव अलग रहता है। महामारी के इस काल में जहाँ स्वास्थ्य के ऊपर खतरा कई गुना बढ़ा है, विश्व की अर्थव्यवस्था भी ध्वस्त हो रही है और मानव जीवन के हर पहलू को इस महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया है, अतः इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दिया जाना आवश्यक है। न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य के अधिकार की व्याख्या करते हुए अपने लिए चिकित्सीय देखभाल को चुनने के अधिकार के दायरे का विस्तार किया है। यह भी कहा है कि इस अधिकार के अंतर्गत, अपनी पसंद की प्रयोगशाला में परीक्षण करने की स्वतंत्रता भी शामिल है और सरकार उस अधिकार को छीन नहीं सकती है। राज्य विशेष रूप से व्यक्ति की पसंद को सीमित करके उसे अक्षम नहीं कर सकता है जब एक ऐसी बीमारी की बात आती है जो उसके या उसके परिजनों के जीवन/ स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।

सरकार ने एक मई से कोरोना टीकाकरण के तीसरे चरण की शुरुआत कर दी है, जिसमें 18 से 44 साल की उम्र के बीच 60 करोड़ से ज़्यादा लोगों को कोरोना का टीका दिया जाना है। लेकिन अब जैसी खबरें आ रही हैं, टीका की उम्मीद लगाए 60 करोड़ लोगों में यह एक छोटा हिस्सा है। 20 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनकी उम्र 45 साल से ज़्यादा है और उन्हें अभी तक टीके की दूसरी डोज नहीं मिल पाई है। जगह जगह से टीकों की अनुपलब्धता की खबरें आ रही हैं। हेल्थ एक्सपर्ट यह मानते हैं, कि पहले 45 साल से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण पूरा हो जाना चाहिए था, विशेषकर जब वैक्सीन की आपूर्ति कम हो रही है। इसी विषय पर टिप्पणी करते हुये, अर्थशास्त्री पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं, “जो लोग ज़्यादा जोखिम वाली स्थिति में दिख रहे थे, सरकार ने उन पर ध्यान दिया। अब 45 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को 60 करोड़ नए वैक्सीन चाहने वालों से प्रतिस्पर्धा करनी होगी। “

कोविड टीकाकरण के तीसरे चरण की घोषणा के बाद, वे लोग जिन्हें एक डोज, मिल चुकी है, ने वैक्सीन सेंटर पर लाइन लगाना शुरू कर दिया है, इस डर से कि वैक्सीन की सप्लाई ख़त्म न हो जाए। सरकार ने भी पहले, पहली और दूसरी डोज का अंतर, 40 दिन से बढ़ा कर, 6 से आठ सप्ताह के बीच, और अब दोनो डोज का यह अंतर और बढ़ा दिया है। यह अंतर, भले ही यह कहा जाय कि, एक्सपर्ट की राय के अनुसार बढ़ाया गया है, पर जनता में यही धारणा बन रही है कि समय रहते वैक्सीन की व्यवस्था न करने के काऱण सरकार ने यह अंतर बढ़ा दिया है। इस बढ़े अंतर से वैक्सीन के असर पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी अलग अलग राय सामने आ रही है। लेकिन केवल यही एक कारण नहीं है, जिससे भारत का वैक्सीनेशन प्रोग्राम संकट में दिख रहा है।

कोरोना टीकाकरण को लेकर भ्रम की स्थिति तब से है जब से सरकार ने इस कार्यक्रम को शुरू करने की बात की है। संक्षेप में, कोरोना टीकाकरण की प्रगति पर नज़र डालते हैं। 

● नवंबर 2020 में प्रधानमंत्री, वैक्सिनेशन प्रोग्राम की समीक्षा करने हेतु, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और भारत बायोटेक के प्रयोगशालाओं का निरीक्षण करने गए। कुछ टीवी चैनल इस इवेंट का वैक्सीन गुरु के नाम से दुंदुभिवादन करने लगते हैं ।

● फरवरी 2021 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भारत के वैक्सिनेशन प्रोग्राम के लिए ₹ 35 हजार करोड़ के बजट की घोषणा करती हैं और जरूरत पड़ने पर और भी बजट उपलब्ध करवाने का भरोसा देती हैं। लेकिन आज तक केंद्र सरकार ने केवल 4500 करोड़ ही वैक्सीन के लिए खर्च किया है। वो भी तब जब देश भर में वैक्सीन के लिए हो हल्ला मच रहा है। 

● अब एक नज़र टीके की कीमतों पर। देश में, एक ही वैक्सीन, केंद्र को 150 रुपए, और राज्यों को 300 रुपया में खरीदनी है। अब इसी आधार पर आगे सोचिए कि, देश में वैक्सिनेशन करवाना किसके लिए ज्यादा सस्ता है ? केंद्र 150 में खरीद कर राज्य को दे या राज्य 300 रुपए में खरीदे ? यानी यदि पूरे देश में राज्य जितने में वैक्सिनेशन करवाएगी उसके आधे में केंद्र करवा देगा तो, किसे वैक्सिनेशन करवाना चाहिए ? केंद्र को या राज्यों को ?

● देश में अब तक, देशव्यापी टीकाकरण  का कार्य केंद्र द्वारा ही संपादित होता रहा है। इससे जुड़ी सारी विशेषज्ञता और इन्फ्रास्ट्रक्चर भारत सरकार के पास है, न कि राज्यों के पास। सारे राज्य अब वैक्सीन कंपनियों को अपनी ज़रूरत के अनुसार, वैक्सीन का ऑर्डर देंगे। इससे अब किसको पहले और कितना मिले, इस पर एक नया विवाद उठ खड़ा होगा। मज़े की बात यह भी होगी कि वैक्सीन गुरु कहीं और से यह तमाशा देखेंगे। 

● जब देश में वैक्सीन की कमी है, तो, केंद्र को खुद ही वैक्सीन खरीदकर राज्यों को दे देनी चाहिए। पर यहां तो, राज्यों पर ही यह जिम्मेदारी डाल दी गयी कि वे खुद ही वैक्सीन की व्यवस्था करें। 

● सरकार यह मिथ्या दावा कर रही है कि उसने दुनियाभर में टीका बांटा है, जबकि वास्तविकता यह है कि, प्राइवेट वैक्सीन कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ने अपने अनुबंध का पालन करते हुए, अनुबंध के अनुसार, वैक्सीन बाहर बेचे हैं क्योंकि वैक्सीन के रिसर्च में उनकी फंडिंग, रॉ मैटेरियल उपलब्धता और उनके द्वारा दिए गए ऑर्डर के तहत कंपनी उसे उपलब्ध करवाने को बाध्य थी। 

● देश के वैक्सीन के लिए न तो सरकार ने कोई ऑर्डर दिए, न ही शोध पर कुछ व्यय किया, न वैक्सीन प्रोडक्शन के इन्फ्रास्ट्रक्चर के  लिए किसी कंपनी को फंड दिए। इसका परिणाम यह  हुआ कि, दुनिया के सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक देश वैक्सीन की किल्लत से आज जूझ रहा है ।

11 मई 2021को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया कि, भारत सरकार ने एक पैसा भी वैक्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए नहीं दिए हैं। यानी जो भी भारत में वैक्सीन बन रहे हैं उनमें इस सरकार का आर्थिक योगदान शून्य है। पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं, “हम दुनिया के एक मात्र ऐसे देश हैं जहाँ प्रांतीय सरकारों को वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से सीधी ख़रीद करने के लिए इजाजत दी गई है। ये फ़ैसला पूरी तरह से सोच समझ कर लिया गया नहीं लगता है। “

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, ” क़ीमतों में भिन्नता चिंताजनक बात है। पूरा वैक्सिनेशन कार्यक्रम निशुल्क होना चाहिए। यह जनता की भलाई के लिए है, और राज्य सरकारें ऊँची क़ीमत में वैक्सीन क्यों ख़रीदें? वे भी कर दाताओं का ही पैसा इस्तेमाल कर रही हैं।”

वैक्सीन पर मचे तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप के बीच, देश के शीर्ष वायरजोलोजिस्ट डॉ गगनदीप कांग, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी में भी हैं ने, यह कहा है कि, ” जब दुनिया के सारे देश, एक साल पहले से ही यह खतरा भांप कर अपने नागरिकों के लिये टीका खरीद रहे थे, तो, अब जब हम खरीदने निकले हैं तो, जो उपलब्धता होगी, वही तो मिलेगा।” 

भारत टीका खरीदने वाले देशों में सबसे फिसड्डी है। जबकि अमेरिका ने, अपने नागरिकों के टीकाकरण पर 10 बिलियन डॉलर का बजट रखा है। डॉ. कांग का बयान ऐसे समय में आया है जब कि महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश ने वैक्सीन के लिये ग्लोबल टेंडर आमंत्रित किये हैं। कई राज्यों में टीकाकरण केंद्र, टीके के अभाव में बंद पड़े हैं। आज स्थिति यह है कि यदि टीके के लिये आर्डर दिए भी जाएं तो दिसम्बर के पहले बड़ी टीका कम्पनियां, उनकी आपूर्ति करने में सक्षम नहीं हैं। क्योंकि उनके पास अन्य देशों के आर्डर पहले से पड़े हैं और वे पहले उनकी आपूर्ति करने के लिये कानूनन बाध्य हैं। इन्हीं सब कारणों से भारत के टीकाकरण कार्यक्रम की व्यापक आलोचना हो रही है। 

जब आग लगती है तो कुँआ खोदना शुरू नहीं किया जाता है। बल्कि पुराने कुंए, बावड़ी आदि का जल उस समय आपात स्थिति में काम आता है। हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर भी ऐसी चीज नहीं है जिसे रातों रात बेहतर बनाया जा सके। रातों-रात, किसी भी बड़े हॉल को बेड, ऑक्सीजन और अन्य मेडिकल उपकरणों द्वारा सुसज्जित कर के उसका उद्घाटन करा कर सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं, और आत्ममुग्ध हुआ जा सकता है, पर रातोंरात, डॉक्टर और अन्य प्रशिक्षित पैरा मेडिकल स्टाफ का इंतज़ाम नहीं किया जा सकता है। इसके लिये एक व्यापक योजना बनानी होगी और सरकारी क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र के भी इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करना होगा।

इस महामारी में निजी अस्पतालों द्वारा किया गया बेहिसाब और संवेदनहीन आचरण, बीमार और आर्थिक संकट झेल रहे, जनता के प्रति एक आपराधिक कृत्य है। पर लोग अपने मरीज की जान बचायें या निजी अस्पतालों की इस बर्बर लूट से बचें। राज्य का यह भी दायित्व है कि वह कोई ऐसा मेकेनिज़्म बनाये जिससे लोग यदि निजी अस्पतालों में इलाज के लिये गए भी हैं तो उनका आर्थिक शोषण तो न हो, और उनकी मजबूरी का कोई लाभ नहीं उठा पाए। सरकार को बेड, दवाओं, अन्य जांचों की एक ऐसी दर तय करनी होगी जिससे एक आम व्यक्ति भी अपना इलाज करा सके और ऐसा भी न हो, कि बीमारी से तो वह बच जाएं, पर विपन्नता और कर्ज से रिकट रिकट के मर जाए। यही संविधान के अंतर्गत दिया गया सम्मान से जीने का अधिकार, प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार को अब अपनी प्राथमिकता लोक कल्याणकारी राज्य के उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए बदलनी पड़ेगी। 

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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