Sunday, June 26, 2022

भारत की वामपंथी पार्टियों के सामने चुनौतियां

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वामपंथी आंदोलन एक वैश्विक परिघटना रही है और इससे जन्म लेने वाली भारत की वामपंथी पार्टियां भी खुद को इस वैश्विक आंदोलन का हिस्सा मानती रही हैं और अब भी मानती हैं। इसकी सबसे मुखर अभिव्यक्ति उनके नामों में दिखाई देती है। भारत की पहली वामपंथी पार्टी ने अपना नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) रखा। इसकी स्थापना 26 दिसंबर, 1925 को हुई थी। इसका निहितार्थ यह है कि विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट पार्टियां अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की शाखाएं हैं। यह परंपरा आज भी कायम है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) से अलग होकर 7 नवंबर, 1964 को स्थापित होने वाली पार्टी ने भी अपना नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ही रखा। उसमें उसने कोष्ठक में (मार्क्सवादी) जोड़ लिया। उसका लोकप्रिय नाम सीपीएम पड़ गया।

सीपीएम को क्रांति से विमुख और पथभ्रष्ट कहकर नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद बनने वाली पार्टी ने भी अपना कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) रखा, जिसका लोकप्रिय नाम सीपीआई (एमएल) पड़ा। इससे टूटकर बनने वाले विभिन्न ग्रुपों ने भी अपना नाम सीपीआई (एमएल) ही रखा, खुद की अलग पहचान के लिए कुछ और जोड़ लिया। सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई (एमएल) ग्रुपों को क्रांति से विमुख और पथभ्रष्ट मानने वाली जो नई पार्टी सामने आई, उसने भी अपना नाम भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ही रखा, उसने अपने नाम के आगे माओवादी जोड़ लिया और उसका नाम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) रखा। इन पार्टियों में बहुत सारे मतभेद हैं, लेकिन सब की सब खुद को सैद्धांतिक तौर पर अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन की एक शाखा मानती हैं। क्योंकि मार्क्स ने ‘ दुनिया के मजदूरों एक हो’ इसका कम्युनिस्ट घोषणा-पत्र (1848) में आह्वान किया था और यह भी कहा था कि मजदूरों का कोई देश नहीं होता है। कम्युनिस्ट आंदोलन अपने वैचारिक स्रोत के अर्थ में वैश्विक रहा है।

सभी कम्युनिस्ट पार्टियों के मूल वैचारिक स्रोत मार्क्स-एंगेल्स और लेनिन की विचारधारा रही है। कुछ पार्टियां अपने वैचारिक स्रोत के रूप में माओ को भी स्वीकार करती हैं और कुछ माओ के विचारों को अपना मूल वैचारिक स्रोत नहीं मानतीं, लेकिन बिना किसी मतभेद के सभी की सभी कम्युनिस्ट पार्टियां मार्क्स-एंगेल्स यानी मार्क्सवाद को अपना सैद्धांतिक आधार मानती हैं। भले ही वामपंथी आंदोलन अपने चरित्र में अंतर्राष्ट्रीय रहा हो और उसके वैचारिक स्रोत भी अंतर्राष्ट्रीय रहे हों,  लेकिन थीं और हैं, वे इसी देश की पैदाइश और उन्हें भारतीय समाज में ही क्रांति या क्रांतिकारी बदलाव करना है, चाहे अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियों की क्रांति या क्रांतिकारी बदलाव की परिकल्पना जो हो। इस स्थिति में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं। एक अंतर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के हिस्से के रूप में और दूसरा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के तौर पर।

भारत सहित दुनिया की सभी कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने जो सबसे पहली चुनौती है,  दुनिया भर की मेहनतकश जनता को यह विश्वास दिलाना कि एक ऐसी दुनिया संभव है, जिसमें कोई किसी का शोषण-उत्पीड़न नहीं करेगा, संसाधनों पर सामूहिक मालिकाना होगा, उत्पादन लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए होगा न कि मुनाफा कमाने के लिए, जीवन के सभी क्षेत्रों में सबके लिए समता एवं स्वतंत्रता होगी, सबकी भौतिक और आत्मिक जरूरतें पूरी होगीं, सबको अपने व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर उपलब्ध होगा और मानवीय समृद्धि और उन्नति का ऐसा मॉडल अपनाया जाएगा, जिसमें प्रकृति एवं पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना लोगों की जरूरतें पूरी की जा सकें। दुनिया भर की जनता के बड़े हिस्से में यह विश्वास एक हद 1917 की रूसी क्रांति ने पैदा किया था और चीनी क्रांति ने इस विश्वास को एक हद तक आगे बढ़ाया था।

इन क्रांतियों की आंतरिक कमजोरियों, नेताओं की मूल-गलतियों, बाद में पूंजीवादी पुनर्स्थापना और अंतिम तौर पर सोवियत संघ के विघटन ने लोगों के विश्वास को बहुत कम कर दिया और पूंजीवाद ही मानव सभ्यता की यात्रा का अंतिम और उच्चतम पड़ाव है, ऐसी घोषणाएं और प्रचार बड़े जोर-शोर से पूंजीवादी मीडिया और पूंजीवादी बुद्धिजीवियों ने किया। इस सब का गहरा प्रभाव दुनिया भर के जनमानस पर पड़ा, जिसमें मेहनतकश वर्ग भी शामिल हैं। इस स्थिति ने शोषण-उत्पीड़न विहीन समाज की चाहत को बहुत दूर का सपना बना दिया। हालांकि दुनिया की वस्तुगत स्थितियां और जनता की आशाएं-आकांक्षाएं क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार हैं, लेकिन नेतृत्वकारी संगठित समूह के तौर पर कम्युनिस्ट पार्टियां जनता की अगुवाई नहीं कर पा रही हैं और इस परिस्थिति का लाभ दक्षिणपंथी पार्टियां उठा रही हैं। जिस मेहनतकश गरीब जनता को कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ होना चाहिए उसका बड़ा हिस्सा दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां भारतीय जनता को नेतृत्व देने में अक्षम साबित हुई हैं, नया जनाधार विकसित करने को कौन कहे, वे पुराना जनाधार भी धीरे-धीरे खो रही हैं। भारत में मेहनतकशों का बढ़ता शोषण-उत्पीड़न, बढ़ती आर्थिक असमनाता, गरीबी, वर्ण-जाति और पितृसत्ता आधारित उत्पीड़न, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ दक्षिणपंथी आरएसएस-भाजपा का निरंतर हमला,  राष्ट्रीयताओं का दमन, बेरोजगारी, कृषि संकट, मंहगाई आदि बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, परिस्थितियां कम्युनिस्ट पार्टियों के अनुकूल हैं, लेकिन वे इस परिस्थिति का फायदा उठाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं दिखाई दे रही हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे वे जड़ता और गतिरूद्धता का शिकार हो गई हों।

भारत सहित दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने दूसरी बड़ी चुनौती समकालीन दुनिया की व्याख्या करना और उसके अनुसार क्रांतिकारी परिवर्तन और जन पहलकदमी के लिए रणनीति एवं कार्यनीति विकसित करना है। यह सच है कि मार्क्स, लेनिन और माओ ने अपने समय की दुनिया की एक व्याख्या की और उसके अनुसार जनपहलकदमी और क्रांतिकारी परिवर्तन की रणनीति और कार्यनीति प्रस्तुत की। मार्क्सवाद एक सामाजिक विज्ञान के तौर आज भी मार्गदर्शक सिद्धांत है, लेकिन इस सामाजिक विज्ञान का इस्तेमाल करके दुनिया और देश-विशेष की परिस्थितियों की व्याख्या करना उस समय और उस देश-विशेष की कम्युनिस्ट पार्टियों का होता है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां ऐतिहासिक तौर पर दुनिया की व्याख्या के लिए कभी इंग्लैंड, कभी रूस और कभी चीन की पार्टी पर निर्भर रही हैं। देश की ठोस परिस्थितियों का ठोस विश्लेषण करके जनपहलकदमी और क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए रणनीति और कार्यनीति विकसित करने में वे कमोवेश नाकाम रही हैं। आज भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के पास ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण का अभाव दिखता है। घिसे-पिटे जड़सूत्रवादी फार्मूले ही ज्यादातर पढ़ने-सुनने को मिलते हैं। जिन पार्टियों के सबसे उन्नत सामाजिक विज्ञान हैं, उनसे उम्मीद की जाती है कि उनका विश्लेषण भी ज्यादा वस्तुगत, तथ्यपरक, तार्किक और वैज्ञानिक हो, लेकिन अक्सर ऐसा देखने को नहीं मिलता। मार्क्सवादी विज्ञान को ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण में लागू करने में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों की कमजोरी और अक्षमता एक बड़ा प्रमाण यह सामने आता है कि किसी ठोस समस्या का ठोस विश्लेषण अलग-अलग कम्युनिस्ट- पार्टियों-ग्रुपों का अलग-अलग होता है, यदि विश्लेषण का विज्ञान एक है, तो विश्लेषण में इतनी भिन्नता क्यों? कहीं न कहीं यह ठोस परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण में मार्क्सवादी विज्ञान को लागू करने की अक्षमता से जुड़ा हुआ है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां मोटी-मोटी तीन हिस्सों में विभाजित हैं। पहला हिस्सा सीपीआई और सीपीएम के रूप में है, जिनका मुख्य जोर संसदीय चुनावों में हिस्सेदारी करके चुनावी जीत हासिल करना और सरकार बनाकर, सत्ता में हिस्सेदारी करके या विपक्ष के रूप जनता के हितों के लिए कार्य करना। इन पार्टियों ने  मिलकर बंगाल में लंबे समय तक शासन किया और अभी केरल में उनकी सरकार है। केंद्रीय सत्ता में भी ये प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर हिस्सेदार रहीं हैं। सीपीआई केंद्रीय कैबिनेट में भी शामिल रही है और सीपीएम बाहर से केंद्र में बनने वाली कई सरकारों का समर्थन करती रही है। आजादी के आंदोलन के दौरान और आजादी के बाद सीपीआई से भारतीय जनता को काफी उम्मीदें थीं। कांग्रेस के बाद सीपाआई का ही देश में सबसे बड़ा जनाधार था।

देश के बहुलांश हिस्से में उसका सांगठनिक विस्तार था। 1964 में विभाजन के बाद सीपाएम बनी, जिसने सीपीआई के बड़े जनाधार और संगठन को अपने साथ कर लिया। आज की तारीख में दोनों पार्टियों में कोई बुनियादी मतभेद नहीं दिखाई देता, फिर भी ये दो अलग-अलग कम्युनिस्ट पार्टियां क्यों है, यह समझ में नहीं आता। धीरे-धीरे इन दोनों पार्टियों का जनाधार और सांगठनिक विस्तार सिमटता गया। पूरे देश के स्तर पर सत्ता के लिए स्वतंत्र पहलकदमी लेने की जगह ये पार्टियां चुनावी राजनीति में इस या उस पार्टी का समर्थन करने लगीं और इस प्रक्रिया में अपना स्वतंत्र जनाधार और सांगठनिक विस्तार खो बैठीं। इन्हें कभी कांग्रेस में प्रगतिशीलता दिखती है, तो कभी कांग्रेस विरोधी विपक्ष में। कांग्रेस विरोध के नाम पर इन्होंने जनसंघ और बाद में भाजपा के साथ भी सहयोग कायम किया और उनके साथ मिलकर बाहर से कांग्रेस विरोधी सरकारों को समर्थन दिया। इन पार्टियों के क्रिया-कलापों को देखकर लगता है कि इन्होंने पूरे देश के स्तर पर सत्ता कायम करने का स्वप्न और आकांक्षा ही  जैसे छोड़ दिया हो, वह सत्ता भले ही चुनावी राजनीति में जीत के माध्यम से ही क्यों न हो। अब इन पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व में जनसंघर्षों से निकले तपे-तापाए नेता कम जेएनयू मार्का बुद्धिजीवी ज्यादा दिखाई देते हैं।

सीपीएम के हाल के वर्षों के दोनों महासिचव (प्रकाश करात और सीताराम येचुरी) किसी जनसंघर्ष या वर्ग-संघर्ष से निकले हुए जमीनी नेता नहीं हैं, ये ड्राइंग रूप पॉलिटिक्स करने वाले  नेता ज्यादा हैं। धीरे-धीरे इन पार्टियों पर मेहनकशत वर्गों के संघर्षों से निकले नेताओं की जगह मध्यवर्गीय नेता हावी होते जा रहे हैं। इसके एक हालिया उदाहरण कन्हैया कुमार थे। हालांकि अब वे सीपाआई छोड़कर कांग्रेस में जा चुके हैं। अभी भी इन दोनों पार्टियों के पास एक कार्यकर्ताओं का एक समूह है, जो पूरी प्रतिबद्धता के साथ जनसंघर्षों में हिस्सेदारी करता है, लेकिन पार्टी की मूल दिशा जनसंघर्षों या वर्ग संघर्षों में हिस्सेदारी की जगह चुनावी जोड़-तोड़ की गणित पर  ज्यादा है। अब इन दोनों पार्टियों की देश व्यापी राजनीति लंबे समय से सांप्रादियकता के एजेंडे के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसका मुख्य जोर भाजपा विरोधी इस या उस पार्टी के साथ चुनावी तालमेल या गठजोड़ तक सीमित है।

सीपीएम के नेतृत्व के सामाजिक पृष्ठभूमि को देखें तो पाते हैं कि इसमें उच्च जातियों नेताओं की भरमार है। सीपीएम के निर्माण (1964) के बाद पहली बार अप्रैल 2022 में कन्नूर (केरल) में हुई पार्टी कांग्रेस में दलित सामाजिक पृष्ठभूमि के रामचंद्र डोम को पोलित ब्यूरो में चुना गया। यह इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर अपरकॉस्ट का कैसे लंबे समय वर्चस्व कायम रहा और सबसे मेहनतकश हिस्से (दलितों) के बीच से कोई शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर नहीं पहुंच पाया।

कम्युनिस्ट पार्टियों का दूसरा समूह नक्सलबाड़ी के आंदोलन (1967) के बाद सामने आया। इसने सीपीएम को भी एक संसोधनवादी (क्रांति से पथभ्रष्ट) पार्टी के रूप में चिन्हित किया और एक नई पार्टी सीपीआई (एमएल) के रूप में सामने आई। इसने खुद क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। इस पार्टी के प्रभाव में देश में एक क्रांतिकारी भावना और चेतना का तेजी से विस्तार हुआ और लोगों में भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन की उम्मीद बनी। लेकिन बहुत जल्दी ही नक्सलबाड़ी आंदोलन बिखर गया और इसके गर्भ से पैदा हुई पार्टी (सीपाआई-एमएल) कई टुकड़ों में बिखर गई। उसके बाद इसके टुकड़े-दर-टुकड़े होते जा रहे हैं। इस समूह के अधिकांश पार्टियों-ग्रुपों ने क्रांतिकारी हिंसा के माध्यम से क्रांति करने के रास्ते का परित्याग कर दिया है। कुछ ने ऐसा घोषित तौर किया और कुछ ने व्यवहार में अघोषित तौर पर किया है। इस समूह की सबसे जनाधार वाली पार्टी सीपीआई (एमएल-लिबरेशन) है, लेकिन उसका भी जनाधार बिहार के कुछ हिस्सों तक सिमटा हुआ है। यह पार्टी भी धीरे-धीरे कमोवेश सीपीआई और सीपीएम के रास्ते पर जा रही है।

यह भाजपा को हराने के नाम बिहार में राजद से चुनावी गठजोड़ कायम की है और अपने कुछ विधायक भी विधान सभा में भेजने में सफल हुई। सिर्फ अपने दम पर बिहार की विधान सभा में अपने विधायक भेजने में यह पार्टी अक्षम होती जा रही है। चुनावी जीत के लिए वह राजद पर निर्भर हो गई है। इसकी अधिकांश रणनीति एवं कार्यनीति चुनावी जीत तक सिमटती जा रही है। एमएल समूह के अन्य बहुत सारे दल और ग्रुप हैं, कुछ चुनाव में हिस्सेदारी करते हैं और कुछ चुनाव का बहिष्कार करते हैं। भारत में सबसे अधिक एमएल समूह की पार्टियां और ग्रुप हैं। ऐसे पार्टियों-ग्रुपों की संख्या सैकड़ों में पंहुच गई है। कहने को तो ये सैद्धांतिक-वैचारिक मतभेदों के नाम पर अलग-अलग हैं, लेकिन मध्यवर्गीय मानसिकता और नेतृत्व के बीच के व्यक्तिवादी अहंकार इनके अलगाव ज्यादा बड़े कारण दिखाई देते हैं। ये आपस में मिलकर कोई साझा मोर्चा और साझी पहलकदमी का कोई मंच भी नहीं बना पा रहे हैं। सैकड़ों छोटे-छोटे टुकड़ों में इनका बिखराव इनकी शक्ति और ऊर्जा को क्षीण कर देता है और ये भारत के मेहनतकश जनता के हित में कोई बड़ी सकारात्मक पहलकदमी नहीं ले पाते हैं।

भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का एक समूह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ( माओवादी) के रूप में संगठित है। जिस पर भारत सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है। जिसे मनमोहन सिंह ने भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित किया। जिसके खिलाफ बड़े पैमान पर भारत सरकार ने सुरक्षा बल लगा रखे हैं। इस पार्टी का मुख्य आधार छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य हैं। देश के अन्य हिस्सों में भी इनकी छिट-पुट उपस्थिति है। ये आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन बचाने के संघर्ष में उनका साथ देते हैं। इनका सीधा संघर्ष कार्पोरेट घरानों से है, जिनकी निगाह आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मौजूद खनिज संपदा पर है। आए दिन माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष की खबरें आती रहती हैं। इस संघर्ष के नाम पर बहुत सारे निर्दोष आदिवासी भी सुरक्षा बलों की गोलियों का शिकार होते हैं।

माओवादी या माओवादियों से संबंध होने के नाम पर आए दिन देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों की गिरफ्तारियां होती रहती हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के नाम पर गिरफ्तार किए गए लोगों पर मुख्य आरोप माओवादियों से संबंध होने का लगाया गया है। ऐसे लोगों में गौतम नवलखा, आनंद तेलतुंबड़े, सुधा भारद्वाज, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक हनी बाबू और स्टेन स्वामी जैसे लोग शामिल हैं। इसमें स्टेन स्वामी की जेल में ही मौत हो चुकी है। इस पार्टी के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ मारे जाने की खबरें आती रहती हैं। यह पार्टी भले ही देश में देश के कुछ हिस्सों में मुख्यत: आदिवासियों में अपना आधार कायम करके क्रांतिकारी प्रतिरोध को जारी रखे है और जन प्रतिरोध की एक शक्ति बनी हुई है और इसके नेता-कार्यकर्ता अकूत कुर्बानियां दे रहे हैं, लेकिन यह पार्टी भी लंबे समय से कोई देशव्यापी जनाधार विकसित नहीं कर पा रही है, कुछ छोटे-छोटे पॉकेटों में सिमटी हुई।

भारत की इन तीन कम्युनिस्ट पार्टियों के समूह के बीच गुणात्मक-मात्रात्मक अंतर होने के बावजूद भी इन तीनों के सामने की कॉमन समस्याएं और चुनौतियां हैं। इनके सामने पहली चुनौती यह है कि जिस मेहनकश वर्ग की ये खुद को प्रतिनिधि मानती हैं, वह मेहनकश वर्ग इन्हें अपनी आशा-उम्मीदों का केंद्र नहीं मानता। भारत के मेहनतकश वर्ग का बड़ा हिस्सा न केवल दक्षिणपंथी विचारधारा और राजनीति का शिकार है, बल्कि उनके मजदूर संगठनों का सदस्य भी है। भारत की इस समय सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मजदूर संघ है, जो पूरी तरह आरएसएस के नियंत्रण में है। भारत के मेहनतकशों का बड़ा हिस्सा असंगठित है, उन्हें संगठित करने का भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के पास न तो ठोस एजेंडा है, न ही सांगठनिक शक्ति और न ही इस कठिन कार्य को अंजाम देने के लिए कार्यकर्ताओं की जरूरी फौज।

कम्युनिस्ट पार्टियां यह दावा करती हैं कि उनके पास परिस्थितियों को विश्लेषित करने का सबसे कारगर विज्ञान (मार्क्सवाद) है,लेकिन वे अक्सर भारत की ठोस परिस्थितियों के ऐसा ठोस विश्लेषण करने से चूक जाती हैं, जिसे पढ़कर लोगों को लगे कि हां यह वाकई सच्चाई को प्रस्तुत करने वाला विश्लेषण है। विश्लेषण के नाम पर अक्सर रटे-रटाए जुमले या सूत्र प्रस्तुत कर दिए जाते हैं, जिनको पढ़कर ऊब होती है। इन पार्टियों की ज्यादातर पत्रिकाएं और मुखपत्र नीरस, ऊबाई और जड़सूत्रवादी विश्लेषणों से भरे होते हैं। पिछले तीस- चालीस वर्षों में देश-दुनिया की परिस्थितियों में गुणात्मक किस्म के परिवर्तन आए हैं, लेकिन अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टियों का विश्लेषण तीस-चालीस वर्ष पुराना है, जिसे वे कुछ मात्रात्मक परिवर्तनों के साथ प्रस्तुत कर देती हैं। कम्युनिस्ट पार्टियों की सैकड़ों पत्रिकाएं है, लेकिन ज्यादातर पत्रिकाएं उन्हीं संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा पढ़ी जाती हैं, जिस संगठन की वे पत्रिका होती हैं। कोई भी ऐसी एक पत्रिका नहीं है, जिसकी स्वीकृति भारत के व्यापक पढ़े-लिखे हिस्से में हो और जिसका लोग इंतजार करते हों। पत्रिकाएं और मुखपत्र रूटीन के काम बनकर रह गए हैं,जिसमें नई सच्चाई का विश्लेषण और सृजनात्कता बहुत कम होती है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का इतने टुकड़ों में बंटे होना भी वामपंथी आंदोलन के समक्ष एक बड़ी चुनौती है। ये टुकड़े एकजुट होने की जगह और टुकड़े होते जा रहे हैं, जिसका परिणाम यह है कि बहुत सारे कम्युनिस्ट ग्रुप किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द संगठित हैं,वहीं व्यक्ति उस संगठन का सब कुछ है। सामूहिक नेतृत्व जैसी कोई चीज ऐसे संगठनों में दिखाई ही नहीं देती, ऐसे संगठनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

उच्च जातीय मध्ममवर्गीय नेतृत्व आज भी कम्युनिस्ट पार्टियों और ग्रुपों की एक बहुत बड़ी समस्या है, आज भी अधिकांश कम्युनिस्ट पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व भारत के तथाकथित उच्च जातियों के हाथ में है, भले ही नीचे के अधिकांश कार्यकर्ता दलित-बहुजन समुदायों के हों। इसके साथ कहने के लिए कम्युनिस्ट पार्टियां मेहनतकशों की पार्टियां हैं, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व में मेहनतकश वर्गों से आए लोग नहीं के बराबर हैं। मध्यवर्ग का पूरी तरह बोलबाला है। कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व के उच्च जातीय मध्यवर्गीय चरित्र में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं है, हां एक नकारात्मक बदलाव यह दिख रहा है कि यह उच्च जातीय मध्यवर्गीय लोग किसी बड़े जनसंघर्ष या वर्ग-संघर्ष से नहीं निकले हैं, बल्कि अपने बौद्धिक आभामंडल के आधार इन पार्टियों के नेता हैं। प्रकाश करात, सीताराम येचुरी और दीपंकर भट्टाचार्य इसके सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं। ये तो कुछ बड़ी पार्टियों के बड़े नेता है, बहुत सारे छोटे-छोटे ग्रुपों की स्थिति इससे भी बदतर है, उनके तथाकथित नेता न जनसंघर्षों- वर्ग संघर्षों से निकले हैं और न ही बौद्धिक तौर पर बहुत उन्नत हैं,ज्यादातर टुटपुजिया टाइप के लोग हैं।

इन सबके बावजदू भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का कार्यकर्ता ही भारतीय जनता के प्रति सबसे अधिक प्रतिबद्ध हैं और सबसे अधिक कुर्बानी देते हैं और कोई भी जनपक्षधर और समाज विज्ञान से लैस व्यक्ति उन्हीं से सबसे अधिक उम्मीद भी करता है, लेकिन समस्याओं का समाधान किए बिना और सामने उपस्थित चुनौतियों को स्वीकार किए बिना वामपंथी आंदोलन और उनसे निकली कम्युनिस्ट पार्टियां भारतीय जन की आशा-आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकती हैं, न देश को ब्राह्मणवादी कार्पोरेट पूंजीवाद के चंगुल से निकाल सकती हैं।

(डॉ. सिद्धार्थ का लेख।)

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