स्थाई भाव बन गई है संघियों की वर्चस्ववादी पेशवाई ग्रंथि

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शाहजी राजे भोंसले (1594-1664) 17वीं शताब्दी के एक सेनानायक और बीजापुर तथा गोलकुंडा के मध्य स्थित जागीर कोल्हापुर के जागीरदार थे। वे कभी एक सल्तनत का आधिपत्य मानते तो कभी दूसरे का। अंतत: 23 जनवरी, 1664 को शिकार खेलते समय घोड़े पर से गिरने से उनकी मृत्यु हो गई।

शाहजी राजे भोंसले के पुत्र शिवाजी राजे भोंसले (1630-1680 ई.) तो किसी और ही मिट्टी का बना था, तो इन दोनों से ही नहीं बल्कि मुगल साम्राज्य के शासक औरंगज़ेब से भी संघर्ष कर 1674 ई. में पश्चिम भारत में स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की नींव रखी और छत्रपति का ताज धारण किया। शानदार राजा हुए, जाणता राजा माने पीपुल्स किंग… लेकिन 3 अप्रैल, 1680 को 52 वर्ष की उम्र में ही चल बसे।

शिवाजी की पहली पत्नी के पुत्र सम्भाजी राजे या शम्भुराजे को पिता की मृत्यु की सूचना दिये बिना ही शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई ने अल्पवयस्क पुत्र राजराम (1689–1700) को गद्दी पर बैठाकर बचे-खुचे राज्य को सम्भाल लिया परन्तु सत्ता पर अपना प्रथम अधिकार जताते हुए सम्भाजी ने माँ-बेटे को कैद कर लिया और कुछ समय बाद उनकी हत्या करवा दी।

अब सम्भाजी राजे या शम्भुराजे (1657-1689) ने गद्दी संभाली। सम्भाजी ने बहुत कम समय के शासनकाल में 210 युद्ध किये और इनमें से एक में भी पराजित नहीं हुए लेकिन अंतिम युद्ध में औरंगजेब से हार गये और उसी की कैद में केवल 31 साल की आयु में 11 मार्च, 1689 को मृत्यु हो गई।

सम्भाजी के बेटे और तीसरे छत्रपति राजाराम प्रथम (24 फरवरी, 1670-3 मार्च, 1700) का कार्यकाल काफी छोटा रहा, जिसमें वे अधिकांश समय मुग़लों से युद्ध में ही उलझे रहे।

राजाराम की मृत्यु के बाद शिवाजी द्वितीय (1696-1707) की माँ ताराबाई ने अपने 4 साल के पुत्र को गद्दी पर बैठाया और स्वयं उसकी संरक्षिका बनीं। शिवाजी द्वितीय के राजा बनने का शाहूजी ने विरोध किया पर वे 17 सालों तक मुगलों के यहां बन्दी बने रहे। जब शाहूजी औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़लों की कैद से छूटे, तो गद्दी पर दावा ठोका।

इसी सदी के शुरुआती दौर तक इस्रायल में येरूशलम को लेकर मुसलमानों से होने वाले युद्धों से त्रस्त यहूदी भारत के कोंकण (महाराष्ट्र) में शरण लेने के बाद हिंदू निम्न वर्गीय चितपावन ब्राह्मण बन चुके थे। उन्हीं में से एक बालाजी विश्वनाथ भट्ट (1662–1720) ने सत्ता प्राप्ति में शाहूजी का साथ दिया, विजय मिली।

शाहूजी छत्रपति हुए और अहसानमन्द होकर बालाजी भट्ट को पेशवा यानी प्रधानमंत्री बना लिया। चतुर विश्वनाथ भट्ट ने सेना और राज्य शासन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के बाद छत्रपति शाहूजी से यह पद अपने परिवार के लिए वंशानुगत निश्चित करा दिया।

छत्रपति शाहूजी के इस निर्णय ने मराठों के भविष्य की दिशा ही बदल दी क्योंकि आगे चलकर छत्रपति कमजोर हुए और पेशवा ही असली शासक बन बैठा। वह प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि सेनानायक भी बन गया। उसने युद्ध में बड़ी सफलताएं भी हासिल कीं और मराठा शासन का विस्तार किया। इसी बीच बालाजी विश्वनाथ भट्ट ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कोंकणस्थ यहूदियों से हिंदू बन गये निम्नवर्गीय चितपावन ब्राह्मणों को भारी संख्या में न केवल ऊंचे-ऊंचे पदों पर बैठा दिया बल्कि उन्हें खेती की जमीनें भी दीं।

शासन-व्यवस्था पर मजबूत पकड़ होने के बावजूद भी समस्या यह थी कि पेशवा, छत्रपति नहीं था। उसे अपनी प्रभुसत्ता बांटनी पड़ती थी। जबकि ग्वालियर के सिंधिया, नागपुर के भोंसले, बड़ौदा के गायकवाड़ और इंदौर के होल्कर सरदार कमोबेश पूरे राजा ही थे।

इसी बीच प्रमुख सरदारों को खुदमुख्तारी (ऑटोनॉमी) दी गयी और एक मराठा संघ अस्तित्व में आया। इस ‘संघ साम्राज्य’ ने मुग़लों तक को दबाए रखा और उनसे कर वसूले। एक समय तो ऐसा भी आया जब पेशवा के बेटे की दिल्ली में ताजपोशी तक तय कर ली गई थी। इस तरह अब ये विशिष्ट महाराष्ट्रीय कुलीन ब्राह्मण बन गये लोग ही देश के शासक थे।

इस प्रकार एक समय इस्रायल से भाग कर भारत में शरणार्थी बनकर आये यहूदियों ने केवल चार-पांच दशक में ही देश की सत्ता के केंद्र में अपने लिए प्रमुख स्थान बना लिया। उनके भीतर श्रेष्ठता का वही हैंगओवर आज तक मौजूद है। इसी वर्ग का मानना है कि अंग्रेजों ने मुग़लों से नहीं बल्कि मराठों (पेशवाओं) से, मराठी बाह्मण वर्ग से, भारत की सत्ता छीनी थी (जो उसे वापस लेनी होगी)।

आजादी के आंदोलन के दौरान उनका वही पेशवा होने का दम्भ कूटनीति से एक ओर सनातन धर्म की हिंदू के रूप में नई व्याख्या गढ़ रहा था तो दूसरी तरफ हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान की भावना को उभार रहा था। मुस्लिमों को बाहरी आक्रांता बताते हुए उन्हें बाहर खदेड़ कर ‘हिंदू धर्म’ को फिर से गौरवान्वित करने की कोशिश कर रहा था लेकिन उस सपने को मोहनदास करमचंद गांधी ने अनायास ही तोड़ दिया।

जब तक कांग्रेस का नेतृत्व इस तथाकथित महाराष्ट्रीय कुलीन यानी रानाडे, गोखले, तिलक के हाथ में रहा, ये लोग कांग्रेस से इस स्तर तक जुड़े रहे कि कांग्रेस को हिदू संगठन मानकर, उसके मुकाबले मुस्लिम लीग खड़ी हो गयी। मगर 1920 के बाद कांग्रेस और देश में गांधी का आना इनके लिए एक जबरदस्त झटका था।

उधर, गांधी समाज के सभी वर्गों के नये-नये लोगों को कांग्रेस की जिम्मेदारी सौंपते हुए आंदोलन को विस्तार देते जा रहे थे। मुस्लिमों, अछूतों, आदिवासियों, महिलाओं, किसानों, मजदूरों, छात्रों आदि को पर्याप्त तवज्जो दे रहे थे। कांग्रेस के गांधीवादी स्वयंसेवक एक इलाके और एक तबके तक सीमित नहीं थे। यानी वे गुजरात, पंजाब, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, दक्षिण सब तरफ सक्रिय थे। और, बिना शक गांधी ही उनके नेता थे।

इस तरह गांधी का यह प्रयोग इनकी सोच के विपरीत गया। तो इस महाराष्ट्रीय गुट ने एक तरफ कांग्रेस की मुखालफत और अंग्रेजों की तरफदारी चालू कर दी, तो दूसरी ओर गांधी जी की हत्या के प्रयास भी शुरू कर दिये। इन्हें उम्मीद थी कि हिंदुओं को कांग्रेस के खिलाफ भड़काने से वह टूट जायेगी। यही वह दौर था जब माधव सदाशिव गोलवलकर और विनायक दामोदर सावरकर कह रहे थे कि यदि अंग्रेज यहां से गये भी तो सत्ता हिंदुओं (यानी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों) को सौंपेंगे।

बहरहाल, अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के साथ मिलकर देश का विभाजन कराने में इस महाराष्ट्रीय गुट को सफलता मिल ही गई।

अब, अंग्रेजों के हटने के साथ ही इस महाराष्ट्रीय वर्ग को हिंदुओं को अखंड भारत बनाने के सपने दिखाते हुए अपने वर्चस्व की वही टूटी हुई श्रृंखला को फिर से जोड़ना था लेकिन नेतृत्व का अवसर तो कांग्रेस ने प्राप्त कर लिया। इसीलिए नफरत एवरेस्ट पर पहुंच गई और अब तक भी निशाने पर मुसलमानों के साथ-साथ कांग्रेस है। जिसका अक्स ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के उद्घोष में देखा जा सकता है।

यही मूल ग्रंथि है।

कांग्रेस के नेता, बल्कि यों कहिए नेहरू, आधुनिक सोच के थे। उनका मॉडल प्रजातांत्रिक और समाजवादी था। जबकि इस महाराष्ट्रीय गुट के दिमाग में इतिहास की खाइयों में दफन हो चुका पेशवाई सामन्तशाही का गौरव अब भी घुसा हुआ था, जिसमें एक हिंदू राज्य (छत्रपति या सनातनी नहीं बल्कि पेशवा का राज = हिंदू राज = ब्राह्मण राज = मराठी ब्राह्मण राज) की संकल्पना थी।

यह उनका अपूर्ण एजेंडा था। तो अब इस महाराष्ट्रीय प्रभुवर्ग ने अपने नए संगठन बनाये, पार्टी बनाई, किताबें लिखीं, शाखाएं लगाकर प्रचार किया, नई-नई कहानियां गढ़नी शुरू की, मिथकों को इतिहास बताया। दुनिया भर के लेखकों, इतिहासकारों, अध्येताओं, रपटों, ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों, न्यायालयी फैसलों, सबूतों को कांग्रेसियों, वामपंथियों, मुसलमानों और विदेशियों द्वारा लिखित इतिहास बताते हुए सिरे से ही नकारना शुरू कर दिया।

ये हिंदू धर्म-विशारद बन बैठे, चीजें अपने अंदाज में बांचने की कला सीखी थी। लक्ष्मीबाई और नाना साहब की बात खूब कहते लेकिन बेगम हजरत महल, शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन और अहमदुल्लाह को भूल जाते। शिवाजी की सेक्युलर नीति याद रही परन्तु टीपू का उल्लेख भूल जाते।

शुरू से उनके दल और संगठन को हिंदू राजे-रजवाड़ों का पूरा सहयोग मिला। आखिर हिंदू राजे कोई मौर्य, गुप्त काल के तो थे नहीं। ये सौ-दो सौ साल पुराने हिंदू राजे मराठा पेशवाई की ही उपज थे। डीएनए एक था और मजबूत होती कांग्रेस के खिलाफ अपना संगठन और हिंदूवादी राजनीतिक संगठन उनकी भी जरूरत थी।

ग्वालियर के जीवाजी राव घनघोर महासभाई थे तो उनके सहयोग से उस दौर में हिंदूवादी दल ग्वालियर इलाके में फूल-फल रहे थे। नेहरू ने ग्वालियर के जीवाजी राव को कांग्रेस में आने का न्योता दिया। वे नेहरू को ना नहीं कह सके तो पत्नी विजय राजे सिंधिया कुछ समय के लिए कांग्रेस में आईं। मगर फिर घर-वापसी हो गयी। देश के दूसरे रजवाड़े भी हिंदू महासभा और उसके आनुषांगिक संगठनों से ही जुड़े। ये सब चितपावनों के संघ को खाद-पानी देते रहे।

बतौर प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने 1969 में राजाओं का प्रिवी पर्स खत्म कर देश की मुख्यधारा के विपरीत चलने वाले इन हिंदूवादी संगठनों की आमदनी के स्रोत को बंद कर एक बड़ा झटका दे दिया।

राजनीतिक अवसरवादी होना इन संगठनों की पेशवाकालीन विरासत और तासीर है। आपातकाल ने इन्हें शानदार मौका दिया। जयप्रकाश नारायण के साथ इन्होंने सत्ता की पहली सीढ़ी चढ़ी। कुछ दिन गांधीवादी समाजवाद का ढोंग भी किया। मगर सत्ता की मलाई मुख लगते ही अपनी मूलधारा में वापस आ गए। इस बार नए दौर के रजवाड़ों यानी कॉरपोरेट ने ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ वाला फार्मूला अपनाते हुए इनके लिए अपनी तिजोरियां खोल दीं।

उग्रवादी हिंसक हिंदुत्व, मुस्लिम विरोध और स्वचयनित इतिहास के डिमेंशिया रोग के रथ पर सवार उस महाराष्ट्रीय संगठन ने अपना देशव्यापी जनाधार तैयार कर अपनी पकड़ लगातार बनाये रखी। साम्प्रदायिक, जातीय ऊंच-नीच का भेदभाव, पुरुषवादी सोच और धूर्तता इनमें रची-बसी है। ऊपर से नाजी और फासिस्ट कार्यप्रणाली व तौर-तरीके भी शामिल होकर करेला नीम की ऊंचाई तक चढ़ गया।

हिटलरी तौर-तरीकों और पेशवाई हैंगओवर में डूबे हुए ये लोग, इनका संगठन हिंदुस्तान की सबसे बड़ी प्रतिगामी फोर्स है। ये सोलहवीं-सत्रहवीं सदी और उससे भी पहले के भारत की मानसिक भावभूमि के साथ इक्कीसवीं सदी के भारत पर राज करना चाहते हैं। इनका दिशासूचक यंत्र भविष्य की ओर नहीं बल्कि भूतकाल की ओर जाने का संकेत करता है। ये न भारतीय संस्कृति के मूलाधार इसकी वैदिक परंपरा को मानते हैं, न लोकतंत्र को स्वीकार करते हैं, न ही समानता-समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता को।

आप उन्नति के नाम पर काल्पनिक विकास, छद्म राष्ट्रवाद, अंधदेशभक्ति, कमजोर विपक्ष या कोई अन्य प्रतीक दिखाकर इनके किसी भी मोहरे को छत्रपति बना दीजिए, ये अपने पैर के अंगूठे से उसका राजतिलक कर देंगे लेकिन वास्तविक रूप से शासन-सत्ता की बागडोर इन्हीं के हाथों में रहेगी। तब तक ये अपने अपूर्ण एजेंडे पर काम करते रहेंगे।

स्पष्ट है कि इनका पेशवाई वर्चस्ववादी अहंकार अधिक समय तक वोटों का मोहताज रहना पसंद नहीं करेगा ! इसीलिए अपने सरसंघचलक को ईरानी शिया नेता आयतुल्ला खोमैनी मुसावी की तरह भारत में हिंदुओं की धार्मिक आस्था और देश की राजसत्ता का एकछत्र अधिष्ठाता देवता बनाने की पुरजोर कोशिश जारी है।

(श्याम सिंह रावत लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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