Friday, January 21, 2022

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विश्व हिंदी दिवस पर विशेष: हिन्दी के नाम पर केवल सियासत हुई, समाधान नहीं हुआ

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एक बार अंग्रेज़ी के वरिष्ठ लेखक कार्लाइल ने अंग्रेजी साहित्य के विद्वान विलियम शेक्सपीयर को श्रध्दांजलि देते हुए कहा था- “हे शेक्सपियर आप बहुत धन्य हैं, क्योंकि आपको हिंदी भाषा वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र हिंदुस्तान स्वीकार कर रहा है और अपनी मातृभाषा हिंदी को तिलांजलि दे रहा है इसलिए मैं आज आपको श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा हूं, भारत की तो अपनी कोई राष्ट्रभाषा है ही नहीं । विश्व के लोकतांत्रिक देशों में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां एक विदेशी भाषा को राष्ट्रभाषा के समान सम्मानित किया जाता है भाषाई आत्महत्या का उदाहरण इसके अलावा कहीं ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा”

आज विश्व हिन्दी दिवस है और इस बीच ओमिक्रोन का खतरा भी कम नहीं है फिर भी हम सब रस्म अदायगी तो कर ही रहे हैं। रस्म अदायगी पर भी बात होगी। पहले बात करते हैं उन पहलुओं की जो अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिन्दी को यूएन की भाषा बनाने की बात करते हैं लेकिन कभी सोचा भी है कि खुद के देश में हिन्दी की हालत क्या है? हिंदी को यूएन की भाषा बनाने की बात अभी खोखली है। अभी कुछ समय पहले प्रसिद्ध हिन्दी कथाकार मन्नू भंडारी जी का निधन हुआ था, अचंभित कर देने वाली बात है कि किसी कैबिनेट मंत्री की तरफ से श्रद्धांजलि के नाम पर दो शब्द तक नहीं फूटे। वो आईटी सेल जो किसी भी मुद्दे को ट्रेंड कराने का माद्दा रखती है उसके सिरमौर स्वयं शिखर धवन के अंगूठे में मोच आने पर, भारतीय क्रिकेट टीम में धवन की कमी खलने की दुहाई देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मौन साध लिया। सवाल है आखिर एक प्रख्यात साहित्यकार को आप श्रद्धांजलि तक नहीं दे सकते फिर हिन्दी के नाम पर यूएन वगैरह में उलूल-जुलूल बातें क्यों?

प्रधानमंत्री लोकल को ग्लोबल बनाने की बात कैसे और किस आधार पर कर सकते हैं? हिंदी भाषी राज्य में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी संख्या धारक है अभी साल 2020 में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की तरफ से हाई स्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा का रिजल्ट जारी हुआ था, जिसमें हिंदी भाषी राज्य के केवल हिंदी विषय के पेपर में 8 लाख से ज्यादा विद्यार्थी फेल हुए थे। यह स्थिति वहां है जहां पर हिन्दी का वर्चस्व है। सरकार का हिन्दी के प्रति प्रेम देखने लायक है। केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई की स्थापना सन् 1929 को हुई इसका आदर्श वाक्य (जो संस्कृत में है) है ‘असतो मा सद्गमय’ है । आदर्श वाक्य संस्कृत में और शिक्षा देंगे अंग्रेजी माध्यम में। ऐसा क्यों? क्यों नहीं इस प्रकार के आदर्श वाक्यों को भारतीय शिक्षा पद्धति से हटा दिया जाए? और इसकी जगह जान कीट्स, और शेक्सपियर के आदर्शों पर चला जाए। इतने रंग ओढ़ने की सरकार को जरूरत ही क्या है? सवाल यह भी है कि केंद्र सरकार क्यों नहीं सीबीएसई में हिन्दी को अपना लेती ? क्या अंग्रेजी, सीबीएसई की बपौती है?

केवल प्रादेशिक शिक्षा बोर्ड में ही हिंदी की हालत खस्ताहाल नहीं है बल्कि देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा सिविल सेवाओं में भी हिंदी का वर्चस्व लगातार गिरता रहा है वर्ष 2014 से हिन्दी माध्यम से सिविल सेवा में परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं और बाद के कुछ सालों में तो हिन्दी माध्यम से रिजल्ट केवल 2% तक ही सिमटकर रह गया है। जबसे सिविल सेवा में सीसेट पेपर को लाया गया है तब से हिन्दी माध्यम के अभ्यार्थी हतोत्साहित होने लगे। इस पेपर के पैटर्न ने हिन्दी भाषी क्षेत्र के अभ्यर्थीयों को लोहे के चने ही चबवाए हैं। सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से अगर हिन्दी भाषी लोग हतोत्साहित होंगे, तब यह हिन्दी जगत के साथ – साथ देश के लिए भी टेढ़ी खीर साबित होगी। यह स्थिति तब है जब देश में लगभग 45% लोग हिन्दी बोलते है और लगभग 65-70% अभ्यर्थी हिंदी माध्यम को चुनते हैं, लेकिन विडंबना तब खड़ी होती है जब हिन्दी माध्यम से सफल अभ्यार्थी दूर-दराज तक दिखाई नहीं देते। सरकार का हिन्दी वासियों के प्रति छल तो देखिए सरकार उस देश में हिन्दी को प्रभावशाली घोषित कर रही है जहां आज भी ग्रुप-सी तक की प्रतियोगी परीक्षा में अंग्रेजी विषय पढ़ना अनिवार्य है।

सिविल सर्विस परीक्षा को छोड़ भी दीजिए तो एनडीए, सीडीएस रक्षा सेवाओं में भी अंग्रेजी का वर्चस्व है और यहां तो परिणाम सिविल सर्विस से भी बुरा है। वहीं एसएससी में जीडी कांस्टेबल को छोड़कर अन्य सभी आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य है यानी आपको ग्रेड-सी लेवल का क्लर्क ही क्यों ना बनना हो, इसके लिए भी अंग्रेजी की अनिवार्यता है।

एक आंकड़ा बताता है कि केंद्र और राज्य सरकारों की 9 हजार के लगभग वेबसाइट हैं जो अंग्रेजी में खुलती हैं। इससे पता लगाया जा सकता है कि सरकारें हिन्दी को प्रोत्साहित करने के लिए कितनी सजग दिखाई दे रही हैं?संसद भवन के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी हिन्दी केवल हिंदी दिवस पर ही बोली जाती है, इसके इतर बजट जिसका आमतौर पर सबसे बड़ा प्रभाव आमजन-जीवन को प्रभावित करता है वो भी बेचारा अंग्रेजी भाषा में ही प्रस्तुत हो रहा है और एक बात क्या किसी ने वित्त मंत्री को हिन्दी में बोलते, लिखते देखा या सुना है?

देवेन्द्र नाथ शर्मा लिखते हैं कि “हिन्दी पर अंग्रेजी का प्रभाव केवल शब्दों के अतिरेक तक ही नहीं है। अधिकतर लोगों को तो दासता भी वरेण्य लगती है किन्तु दासता वरेण्य है नहीं। जो भाषा के स्वरूप और चेतना से परिचित होते हैं, वे उसकी निजता की हानि को राष्ट्रीयता की हानि के समान चिंत्य मानते हैं” लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं स्वातंत्र्योत्तर भारत में राष्ट्रवाद जिस अर्थ में प्रयोग किया जाता है वो उसके मायने अब चीड़-फाड़ ,मार-काट वाले रस में प्रयोग होते हैं। आखिर राष्ट्रवाद के झंडाबरदार हिन्दी को लेकर कोई आंदोलन क्यों नहीं करते? देश में तथाकथित राष्ट्रवाद है तभी तो हिन्दी को उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। हम हिन्दी दिवस पर बधाई और शुभकामनाएं देकर केवल रस्म निभा रहे हैं यकीन मानिए हिन्दी तो क्या इससे इंच भर किसी का भला नहीं हो सकता।

आज हिन्दी के नाम पर विश्वविद्यालयों में निर्मित मठों से हिन्दी को बाहर आना ही होगा। ये मठ हिन्दी को अपनी बपौती तो समझते हैं लेकिन उसके लिए खड़े होने का माद्दा इनमें कहां है? आज हिन्दी प्रेमियों को, साहित्यकारों को स्वानुभूत के इस कुंठित दृष्टिकोण से बाहर आना होगा। यह तो तय है, हिन्दी के उज्जवल भविष्य की कामना की पूर्ति कम से कम क्लिष्टता से तो नहीं होने वाली। इसके लिए हमें हिन्दी को अपना राष्ट्रीय दायित्व समझना होगा वरना यह वो समय है जब तथाकथित राष्ट्रवाद की आड़ में दशक छोड़िए, सदियां बीत जाएंगी हमारी, लेकिन हम हिन्दी दिवस के अवसर पर केवल और केवल बधाई और शुभकामनायें तक ही सीमित रह जाएंगे।

(प्रत्यक्ष मिश्रा स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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