सिक्किम त्रासदी-2: बांधों का मोह और तमाम चेतावनियों की उपेक्षा

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हिमालयी इलाकों में जब आप सैर के लिए जाते हैं तो किसी पन-बिजली परियोजना के बनने का अहसास निकट पहुंचते-पहुंचते होने लगता है। हिमाचल हो, उत्तराखंड हो या सिक्किम- हर जगह मैंने एक-सा हाल देखा है। सड़कें अचानक चौड़ी और धूल-भरी होने लगती हैं, पहाड़ों की खूबसूरती नदारद होने लगती है, नजारा भयावह सा लगने लगता है।

साल 2009 में जब हम चुंगथांग पहुंचे तो तीस्ता III परियोजना का काम शुरू हुए एक साल बीत चुका था। दो नदियों के संगम पर बसा छोटा-सा खूबसूरत चुंगथांग कस्बा ट्रकों की आवाजाही, प्रोजेक्ट कर्मचारियों व मजदूरों की रिहाइश, पहाड़ काटती मशीनों के शोर के कोलाहल में डूबा था। सब तरफ धूल-मिट्टी का बोलबाला था।

आप अंदाजा लगाइए कि सुदूर सिक्किम में करीब 1800 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ी वादी में बसा यह कस्बा पूरी रात मशीनों का शोर झेल रहा था। हम उस रात चुंगथांग में ही रुके क्योंकि हमारी योजना अगले दिन गुरुडोंगमार लेक जाने की थी। (हालांकि बारिश की वजह से रास्ता बंद हो जाने के कारण हमें अगले दिन गुरुडोंगमार के बजाय लाचुंग की तरफ ही निकलना पड़ा।)

प्रोजेक्ट का बांध लाचेन व लाचुंग के संगम से करीब आधा किलोमीटर नीचे की तरफ बन रहा था। उस शाम चुंगथांग के बाजार में टहलते हुए हम कई लोगों से मिले। उनमें तीस्ता ऊर्जा लिमिटेड के कुछ कर्मचारी भी थे, खास तौर पर वे अधिकारी जो प्रोजेक्ट के पर्यावरण इंपैक्ट की निगरानी कर रहे थे। इस बात की हैरानी हमें उस समय भी हुई थी कि पर्यावरण इंपैक्ट की निगरानी करने वाला अधिकारी दरअसल बिजली कंपनी का ही वेतनभोगी कर्मचारी है।

अब यह बात हमेशा परेशान करने वाली लगती रही है कि अगर कंपनी के प्रोजेक्ट से पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंच रहा होगा तो कोई अधिकारी- जिसका स्थानीय इकोसिस्टम से कोई जुड़ाव या वास्ता नहीं- उसी कंपनी के खिलाफ कैसे रिपोर्ट देगा जो उसे तनख्वाह दे रही है। यह आपको हर प्रोजेक्ट के मामले में देखने को मिल जाएगा।

बहरहाल, तीस्ता III परियोजना 2017 में चालू हो गई, जिसकी बिजली उत्पादन क्षमता सिक्किम की कुल बिजली मांग का 12 गुना थी। इरादा था बिजली पड़ोसी राज्यों को निर्यात करने का। परियोजना के अगले दो चरण नीचे की तरफ और बन रहे थे जिनमें से एक तो पश्चिम बंगाल में कालिम्पोंग के निकट था।

युमथांग व लाचुंग से लौटते हुए हम सिक्किम के तत्कालीन पर्यटन सचिव के खास सुझाव पर मंगन से नाम्प्रिकदांग की तरफ चले गए थे। चुंगथांग से चलकर तीस्ता नदी इसी तरफ आती है। नाम्प्रिकदांग तीस्ता व थोलुंग चू (रांगित) नदी के संगम पर स्थित है। यह दरअसल ज़ोंगू इलाका कहलाता है और इसे लेपचाओं का पहला बसेरा माना जाता रहा है।

लेपचा संस्कृति को बचाए रखने के लिए बाद में इस इलाके को लेपचा रिजर्व घोषित कर दिया गया था। यहां बाहरी लोगों के जाने पर रोक थी और सैलानियों के अलावा सिक्किम के अन्य इलाकों के लोग भी बगैर परमिट के यहां नहीं जा सकते थे। धीमे-धीमे यह सख्ती कुछ कम होती चली गई। लेकिन यह इलाका अब भी आम लोगों की पहुंच से थोड़ा दूर है।

मंगन उत्तरी सिक्किम जिले का मुख्यालय है। यहां से ज़ोंगू है तो महज 18 किलोमीटर की दूरी पर लेकिन बीच में तीस्ता नदी पड़ती है। मंगन से पहले नीचे आठ किलोमीटर दूर संगक्लांग तक उतरना पड़ता है। संगक्लांग में ही तीस्ता नदी पर बना पुल लेपचाओं के इलाके का एकमात्र संपर्क रास्ता है। इस पुल से ठीक पहले ही पुलिस चौकी है जो जांच के बाद ही आपको आगे जाने देती है।

इस बार की तीस्ता की बाढ़ में यह पुल बह गया और जोंगू इलाके का बाकी सिक्किम से संपर्क कट गया। पुल काफी ऊंचा था, लेकिन मिली जानकारियों के अनुसार जब लोहनाक झील से निकला पानी व मलबा चुंगथांग में तीस्ता तक पहुंचा और बांध ढहा तो नदी का जलस्तर 10 से 15 मीटर तक बढ़ गया। यह बहुत ज्यादा होता है।

हम उस समय ज़ोंगू में पीडब्लूडी के रेस्टहाउस में रुके थे, जो ठीक तीस्ता नदी के किनारे था। नदी के अलावा वहां सारा इलाका घने जंगलों से घिरा था। आबादी बहुत कम और छितरी हुई है। उस निपट खामोश इलाके में भी उस रात, पूरी रात भर हमें नदी में बड़े-बड़े पत्थर गिरने की आवाज आती रही। यह एक चौंका देने वाला अनुभव था। चुंगथांग वहां से बमुश्किल 30 किलोमीटर ऊपर रहा होगा। अगली सुबह हमने गंगटोक लौटते हुए नदी के दूसरे छोर पर जमकर रेत का खनन होते देखा। ट्रक के ट्रक नदी के पाट पर उतरे हुए थे।

4 अक्टूबर की बाढ़ में ज़ोंगू का वह समूचा इलाका, जहां हम रुके हुए थे बाढ़ के पानी व मलबे से अट गया था। यहां के लोगों को रस्सी बांधकर ट्रॉली के सहारे और हेलिकॉप्टर से रसद पहुंचाई जा रही थी। यहां से आगे नीचे कालिम्पोंग तक तीस्ता का पाट फैलता चला जाता है और नदी के किनारे आबादी भी बढ़ती चली जाती है। इसलिए नीचे सिंगताम और उससे भी आगे रंफू में बाढ़ से काफी नुकसान हुआ। चुंगथांग से ऊपर उत्तरी सिक्किम में सैकड़ों सैलानी भी फंस गए क्योंकि चुंगथांग से गंगटोक तक नीचे आने का एकमात्र सड़क संपर्क मार्ग कट गया।

सिक्किम में अक्टूबर के पहले पांच दिनों में सामान्य से दोगुनी बारिश हुई। इससे पहले 1968 में यहां बाढ़ में करीब एक हजार लोगों की जानें गई थीं। इस बार की बाढ़ से हुए नुकसान का अभी तक तो आकलन ही नहीं हो पाया है क्योंकि घटना के दस दिन बाद तक सौ से ज्यादा लोग लापता हैं।

5200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लोहनाक झील चुंगथांग बांध से करीब 60 से 65 किलोमीटर ऊपर की तरफ होगी। बारिश के बाद जब झील बह गई तो उसके पानी को नीचे पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और रास्ते में बाकी धाराओं का पानी व मलबा समेटकर उसका असर कई गुना बढ़ता गया जिसे बांध बरदाश्त नहीं कर पाया। 4 अक्टूबर की भोर होते-होते तीस्ता नीचे रंग्फू तक उफान पर आ चुकी थी। लोगों को किसी तैयारी का वक्त नहीं मिला।

लोहनाक झील क्यों ढही, अभी तक ये साफ नहीं। बारिश, 3 अक्टूबर को आए भूकंप के झटके- जैसे कई कारण गिनाए जाते रहे। बाढ़ के बाद कई घंटों तक किसी को अंदाजा ही नहीं था कि आखिर हुआ क्या है। शुरू में तो सरकारी महकमे बादल फटने को कारण बताते रहे। बाद में पता चला कि यह जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) यानी ग्लेशियर से बनी झील के फट जाने से आई बाढ़ है।

चुंगथांग से ऊपर लाचेन व गुरुडोंगमार जाने वाला रास्ता, आगे नेपाल व चीन सीमा के नजदीक जाता है। इसलिए उस तरफ सेना की भी काफी तैनाती है। अचानक आई बाढ़ में सेना का भी काफी नुकसान हुआ- जान व माल दोनों का।

सवाल यह है कि तीस्ता III परियोजना पर इस बात का खतरा हमेशा से था। फिर भला क्यों न तो इतने सालों में कोई अग्रिम चेतावनी प्रणाली विकसित हो पाई और न ही इस तरह की आपदा से निबटने का तंत्र बना। इतनी नाजुक जगहों पर बांध बनने के ख्याल पर ही प्रश्नचिह्न तो खैर है ही।

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(लेखक ट्रैवल पत्रकार हैं और मौसम व पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं।)

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